उस इस्लाम की पोल खोलता रामनवमी में हिंसात्मक चेहरा, जिसे ‘अमन’ का नाम दिया जाता है

उस इस्लाम की पोल खोलता रामनवमी में हिंसात्मक चेहरा, जिसे ‘अमन’ का नाम दिया जाता है

मैं उस घराने से आता हूँ, जहाँ बचपन में मुझे सिखाया गया कि ‘इस्लाम’ नाम ही अमन (शांति) है। मुझे बताया गया कि यह दीन दुनिया की सबसे सहिष्णु शिक्षा देता है। लेकिन जब मैंने अपनी आँखों से कुरान और हदीस की उन आयतों को पढ़ा, जिन्हें मस्जिदों के मिम्बर से हमेशा छिपाकर रखा जाता है, तो मुझे असलियत पता चली। आज जब मैं रामनवमी के जुलूसों पर हो रहे पथराव की खबरें पढ़ रहा हूँ, तो मुझे वही पुरानी कहानी नजर आ रही है। वही कहानी, जो 1400 साल पुरानी है, लेकिन आज भी उतनी ही ताजा है।

कुछ दिन पहले ईद थी। हिंदू भाइयों ने फूल बरसाए। उन्होंने सच्चे दिल से ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ में विश्वास किया। लेकिन जैसे ही रामनवमी आई, वही लोग, जिन पर फूल बरसे थे, उन्होंने हिंदुओं पर पत्थर बरसा दिए। महाराष्ट्र हो, बंगाल हो, बिहार हो या झारखंड—हर जगह एक ही पैटर्न: इस्लामी भीड़, पत्थरबाजी, मस्जिद के पीछे से हमला, और फिर वही पुराना बहाना—’हमारी भावनाएँ आहत हुईं’।

एक एक्स-मुस्लिम होने के नाते, मैं इस मानसिकता को अच्छी तरह समझता हूँ। यह कोई ‘गलतफहमी’ नहीं है। यह इस्लाम की उस शिक्षा का परिणाम है, जो ‘दारुल इस्लाम‘ (इस्लाम का घर) और ‘दारुल हर्ब‘ (युद्ध का घर) में बाँटती है। जब तक दूसरा समुदाय (गैर-मुस्लिम) विनम्रता दिखाता है, फूल बरसाता है, तब तक वह ‘जजिया‘ देने वाले की तरह सहन किया जाता है। लेकिन जैसे ही वह अपनी आस्था का प्रदर्शन करता है, जैसे ही भगवा ध्वज फहराता है, वैसे ही वह इस्लामी मानसिकता के ‘अहंकार‘ से टकरा जाता है।

‘मस्जिद के पीछे से पत्थर’: यह इस्लामी चरित्र है

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में रामनवमी का जुलूस शांति से निकल रहा था। भजन-कीर्तन हो रहे थे। लेकिन जैसे ही जुलूस मस्जिद के पास पहुँचा, ‘मस्जिद के पीछे से’ पत्थर आने शुरू हो गए। यह ‘पीछे से’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लाम की शिक्षा में ‘तकिया’ (छल) की इजाजत दी गई है। जहाँ आप सीधे सामने नहीं लड़ सकते, वहाँ पीठ पीछे वार करो।

मैं खुद बचपन में उन मदरसों की किताबें पढ़ता था, जहाँ गैर-मुस्लिमों को ‘काफिर‘ और ‘नापाक‘ कहा जाता था। उनकी पूजा, उनके प्रतीक, उनके झंडे—इन सबको अपवित्र माना जाता था। जब आप किसी की आस्था को ही अपवित्र मानकर बड़े होते हैं, तो जब वह आस्था आपके सामने विधिवत रूप से प्रकट होती है, तो आपका ‘ईमान‘ उसे सहन नहीं कर पाता। परिणाम? पत्थर।

‘खातून’ का हमला: इस्लामी ‘उम्माह’ की एकजुटता

मुंबई के मालवणी में एक महिला, खातून, रामभक्त पर हमला करती दिखी। मीडिया इसे ‘एक महिला का उग्र रूप’ कहकर पेश कर रहा है, लेकिन मैं इसे इस्लामी ‘उम्माह‘ (समुदाय) की एकता का उदाहरण मानता हूँ। इस्लाम में स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, सभी को ‘जिहाद‘ (संघर्ष) में शामिल होने का निर्देश दिया गया है, जब भी ‘इस्लाम’ को खतरा महसूस हो।

हम अक्सर कहते हैं कि ‘कट्टरपंथी‘ अलग होते हैं, मुसलमान अलग। लेकिन गढ़वा (झारखंड) में शांति समिति की बैठक में दोनों पक्षों ने शांति से त्योहार मनाने की सहमति दी थी। फिर भी, रामनवमी पर वही मुस्लिम पक्ष पुलिस पर पत्थर फेंक रहा था। बंगाल के मुर्शिदाबाद और पुरुलिया में भगवा ध्वज को नीचे गिराया जा रहा था। राजस्थान में शोभायात्रा के ट्रैक्टर को रोककर तोड़फोड़ की जा रही थी।

यह ‘कुछ असामाजिक तत्वों‘ का काम नहीं है। यह एक विचारधारा का काम है। यह उस विचारधारा का काम है, जो सिखाती है कि ‘काफिरों‘ का त्योहार ‘हराम‘ है और उसके प्रदर्शन को रोकना हर मुसलमान का फर्ज है।

तुष्टीकरण: वह ईंधन जो आग को हवा देता है

पश्चिम बंगाल की ममता सरकार हो या पहले की कांग्रेस सरकारें, ‘तुष्टीकरण’ की राजनीति ने इस मानसिकता को और मजबूत किया है। जब पुलिस हमेशा हिंदू जुलूसों को ‘परमिशन’ के लिए रोकती है, लेकिन पत्थरबाजी करने वालों को ‘भावनाएँ आहत’ होने का बहाना देकर छोड़ दिया जाता है, तो यह संदेश जाता है कि ‘हिंसा करने पर भी कुछ नहीं होगा’।

बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी का सवाल—”क्या अपने ही राज्य में भगवा ध्वज फहराना अपराध है?”—बिल्कुल सही है। लेकिन इससे भी गहरा सवाल यह है कि आखिर क्यों एक विशेष धर्म के लोग दूसरे धर्म के झंडे को सहन नहीं कर पाते? इसका जवाब इस्लाम की मूल पाठ्य सामग्री में छिपा है, जहाँ ‘शिर्क‘ (मूर्तिपूजा) को सबसे बड़ा अपराध और ‘कु्फ्र’ (अविश्वास) को युद्ध का कारण बताया गया है।

एक एक्स-मुस्लिम की पीड़ा और चेतावनी

मैं आज भी उन लाखों मुसलमानों की स्थिति को समझता हूँ, जो इस कट्टरता के शिकार हैं और जिन्हें इस्लाम के नाम पर जहर पिलाया जा रहा है। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि जब तक इस्लाम के उन हिस्सों की निंदा नहीं की जाएगी, जो हिंसा को वैधता देते हैं, तब तक यह सिलसिला जारी रहेगा।

होली पर हमला,दिवाली पर हमला, सरस्वती पूजा पर हमला, दुर्गा पूजा पर हमला, रामनवमी पर हमला । आखिर क्यों हर हिंदू त्योहारों और जुलूसों पर हमला होता है। अगर आज कोई ‘गौरक्षा‘ और ‘लव जिहाद‘ की बात करता हैं, तो इसे ‘सांप्रदायिक‘ करार दे दिया जाता है। लेकिन जब हिंदुओं के त्योहारों पर पत्थर बरसते हैं, तो क्या यह ‘सांप्रदायिक‘ नहीं है? क्या यह ‘आतंक‘ नहीं है?

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने ठीक कहा है कि शांति के दुश्मनों के खिलाफ लोकतांत्रिक शक्ति के प्रयोग से परहेज नहीं है। लेकिन मैं यह भी कहूँगा कि इस्लामी कट्टरपंथ से लड़ने के लिए सिर्फ पुलिस बल ही काफी नहीं है। इसके लिए उस विचारधारा का खंडन करना होगा, जो ‘हम’ और ‘तुम’ की दीवार खड़ी करती है।

निष्कर्ष: ‘फूल’ का जवाब ‘फूल’ होना चाहिए, ‘पत्थर’ नहीं

ईद पर फूल बरसाने वाले हिंदू भाइयों ने दिखा दिया कि सहिष्णुता की पराकाष्ठा क्या होती है। लेकिन उस सहिष्णुता का फायदा उठाकर रामनवमी पर पत्थर बरसाना, यह बताता है कि इस्लामी मानसिकता में ‘बराबरी‘ की कोई जगह नहीं है। वहाँ तो सिर्फ  (मुस्लिम) और  (गैर-मुस्लिम) का द्वैत है।

मैं अपने उन भाइयों से कहना चाहूँगा, जो अब भी उस धर्म की चादर में लिपटे हुए हैं: इस्लाम की असली पहचान उसकी कट्टरता नहीं, बल्कि उसके अनुयायियों का चरित्र है। अगर आपका चरित्र यह कहता है कि दूसरे के त्योहार पर पत्थर मारना सही है, तो समझ लीजिए कि आप धर्म से नहीं, एक अहंकारी मज़हब से जुड़े हैं।

जब तक हम इस सच्चाई को नहीं मानेंगे कि इस्लाम के नाम पर फैलने वाली यह कट्टरता एक वैश्विक समस्या है, तब तक हर साल रामनवमी, होली, और दशहरे पर यह तस्वीर दोहराई जाएगी। मैं एक एक्स-मुस्लिम के रूप में कहता हूँ—अब और नहीं। हर नागरिक को समान अधिकार मिलने चाहिए, और जो कोई भी पत्थर उठाएगा, उसे कानून के सामने जवाबदेह होना होगा।

जय हिंद।

यह ब्लॉग एक एक्स-मुस्लिम के नजरिए से लिखा गया है, जो इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ आवाज उठाता है और सभी मतों के लिए समान अधिकारों की वकालत करता है।

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