सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड: इतिहास की सच्चाई और इस्लामी अलगाववाद का चेहरा

सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड: इतिहास की सच्चाई और इस्लामी अलगाववाद का चेहरा

कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर वीर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया गया है। भाजपा सरकार का यह कदम कुछ लोगों को चुभ रहा है, खासकर कांग्रेस और वामपंथियों को। लेकिन मेरी नजर में यह इतिहास की एक छोटी सी भूल को सुधारने का प्रयास है।

सुहरावर्दी परिवार: एक ही सिक्के के दो पहलू

कांग्रेस वाले चिल्ला रहे हैं कि यह सड़क “हुसैन शहीद सुहरावर्दी” नहीं, बल्कि उनके चाचा **डॉ. हसन सुहरावर्दी** के नाम पर थी। हसन सुहरावर्दी कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम वाइस चांसलर थे, सर्जन थे। लेकिन क्या सिर्फ यही सच है?

1932 में बीना दास नाम की बहादुर क्रांतिकारी ने ब्रिटिश गवर्नर पर गोली चलाई थी। हसन सुहरावर्दी ने बीना दास को पकड़कर ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया। इस “वफादारी” के इनाम में उन्हें ‘सर’ की उपाधि मिली और उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम सुहरावर्दी एवेन्यू रख दिया गया।

हुसैन शहीद सुहरावर्दी तो “बंगाल के कसाई” के नाम से मशहूर हैं। 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे पर मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने हिंदुओं के नरसंहार को बढ़ावा दिया। कोलकाता की सड़कें हिंदू खून से लाल हो गईं। पुलिस को बैरक में बंद रखा गया, मुस्लिम भीड़ को खुली छूट दी गई। बाहर के मुसलमानों को बुलाया गया था, उन्हें हथियार, वाहन और पेट्रोल की व्यवस्था की गई थी।

दोनों सुहरावर्दी एक ही परिवार के थे। एक ने क्रांतिकारी को ब्रिटिशों को सौंपा, दूसरे ने लाखों हिंदुओं की हत्या का माहौल बनाया। परिवार की विचारधारा साफ थी — अंग्रेजों की चाटुकारिता और मुस्लिम अलगाववाद।

गोपाल मुखर्जी (गोपाल पाठा): सच्चा शेर

जिस गोपाल मुखर्जी के नाम पर सड़क रखी गई, वे “गोपाल पाठा” के नाम से जाने जाते थे। 1946 के हिंदू नरसंहार में जब मुस्लिम भीड़ हिंदू इलाकों पर टूट पड़ी, तब गोपाल पाठा ने हिंदुओं की रक्षा के लिए संगठित प्रतिरोध किया। जब जवाबी कारवाही मुस्लिम दंगाइयों पर किया गया तब जाकर मुस्लिम पीछे हटे। उनके इस कदम के कारण  हजारों निर्दोषों हिन्दुओं की जान बची। यह कोई आक्रामक communalism नहीं था — यह आत्मरक्षा थी, जिसे हर सभ्य समाज में जायज माना जाता है।

हिंदू समाज में ऐसे वीरों को हमेशा भुला दिया जाता रहा, जबकि आक्रमणकारियों के नाम सड़कों पर चमकते रहे।

एक्स-मुस्लिम की नजर से

मैंने कुरान, हदीस और इस्लामी इतिहास पढ़ा है। द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, जिहाद की मानसिकता और काफिरों के प्रति घृणा — ये चीजें सुहरावर्दी परिवार में भी दिखती हैं। पाकिस्तान बनने के बाद परिवार का एक हिस्सा वहां चला गया। भारत में रहने वाले मुसलमानों को बार-बार “सेकुलर” तुष्टिकरण दिया गया, लेकिन हिंदू पीड़ितों की कहानियां दबाई गईं।

कांग्रेस-वामपंथी गठजोड़ ने हमेशा इस्लामी अपराधों को सफेद किया है। नेहरू का सुहरावर्दी परिवार से लगाव प्रसिद्ध है। आज भी वही पुरानी तुष्टिकरण की राजनीति चल रही है। नाम बदलना सिर्फ प्रतीक है। असली बदलाव तब आएगा जब हम इतिहास को पूरी सच्चाई से पढ़ेंगे और “सेकुलरिज्म” के नाम पर झूठ को नकारेंगे।

निष्कर्ष

सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलना सच्चे हिंदुस्तान की बहाली है। यह बीना दास जैसे वीरों और गोपाल पाठा जैसे रक्षकों को सम्मान देना है। जो लोग इस पर आपत्ति कर रहे हैं, वे या तो इतिहास नहीं जानते या जानबूझकर सच्चाई छिपा रहे हैं।

भारत एक हिंदू बहुल देश है। यहां हिंदू भावनाओं का सम्मान होना चाहिए, बिना किसी guilt complex के।

जय हिंद। जय गोपाल पाठा।

यह ब्लॉग उन सभी के लिए है जो इतिहास को राजनीतिक चश्मे के बिना देखना चाहते हैं। सच्चाई हमेशा जीतती है।