भारतीय इस्लामी कट्टरपंथ का नया चेहरा: ईरान के लिए जज्बा, भारत के लिए जहर

भारतीय इस्लामी कट्टरपंथ का नया चेहरा: ईरान के लिए जज्बा, भारत के लिए जहर

 

नमस्कार दोस्तों,

मैं एक भारतीय एक्स-मुस्लिम हूँ, जिसने इस्लाम की कट्टरता को करीब से देखा है। आज मैं इस्लामी कट्टरपंथ के उन चेहरे को बेनकाब कर रहा हूँ जो भारत में रहते हुए भी भारत को अपना देश नहीं मानते। हाल ही में एक वायरल वीडियो ने एक बार फिर सच्चाई उजागर कर दी है – कश्मीर की बुर्काधारी महिलाएँ भारतीय सेना को “शराबी-बलात्कारी” कह रही हैं और साफ़-साफ़ बता रही हैं कि उनका दान ईरान के “रहबर” खामेनेई के लिए है, भारतीय सेना के लिए नहीं।

ये कोई इंसिडेंट नहीं, ये पैटर्न है।

पिछले १२ सालों में ऐसे दर्जनों वीडियो आए हैं। ईरान-इजरायल तनाव हो या फिलिस्तीन का मुद्दा, भारतीय मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा  – सड़कों पर उतरकर विदेशी मुल्कों के लिए नारे लगाता है। लखनऊ में बुर्काधारी महिला कहती है – “खामेनेई के लिए जान हाजिर है”। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों का यही राग। मौलाना साजिद राशिदी तो खुलेआम कह देते हैं – “अगर भारत और ईरान में युद्ध हुआ तो भारतीय मुसलमान ईरान के साथ खड़े होंगे”।

सोचिए।
ये लोग ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान के खिलाफ फंड जमा करने या “पाकिस्तान मुर्दाबाद” बोलने नहीं निकले। लेकिन ईरान के लिए फंडिंग? वो भी कश्मीर से! हिंदू देख रहे हैं – कश्मीरी मुस्लिम अपने घर से ईरान को इजरायल के खिलाफ हथियार खरीदने के लिए पैसे जमा कर रहे हैं।

ये सांप पालने जैसा है या नहीं?

मैं पूछता हूँ – ये “मानवता” कहाँ जाती है जब भारत में आपदा आती है?
2001 का गुजरात भूकंप हो या 2015 का नेपाल भूकंप – पूरे देश ने मदद भेजी। लेकिन क्या कभी कश्मीर या केरल के कट्टरपंथी मुस्लिमों ने गैर-मुस्लिमों के लिए जकात जमा करते देखा? कभी नहीं। उनकी “इंसानियत” सिर्फ मजहब तक सीमित है। हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले पर भी इनके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। बल्कि इजरायल को गलत ठहराने का नैरेटिव चला।

अब ये लोग कह रहे हैं – भारतीय सेना “शराबी-कबाबी” है, इसलिए हम दान नहीं देंगे।
वही सेना जो कश्मीर में इनके बच्चों की सुरक्षा करती है। वही सेना जो बाढ़, भूकंप, आतंकवाद में सबसे आगे रहती है। वही सेना जिसके कारण ये कट्टरपंथी सुरक्षित सो पाते हैं।

मैं इन कट्टरपंथियों से सीधा सवाल पूछता हूँ:

– भारत में जन्मे, भारत की हवा में साँस लेते, भारत की जमीन पर पलते हो, लेकिन ईरान को “रहबर” और “भाई” कहते हो?
– सेना को गाली देते हो, लेकिन उसी सेना की छावनियों में पनाह माँगते हो जब आतंकवादी आते हैं?
– अभिव्यक्ति की आजादी का ढोंग रचते हो, लेकिन देश की संप्रभुता और सेना का अपमान करते हो?

ये सेकुलरिज्म का बोझ सिर्फ हिंदुओं पर क्यों?
लेफ्ट-लिबरल और सेकुलर इनकी हरकतों को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहकर चुप करा देते हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि जो अपनी मातृभूमि के प्रति वफादार नहीं, वो किसी और के कैसे हो सकते हैं? जो हिंदुओं को “काफिर” कहते हैं, वो हिंदुओं की सहिष्णुता का फायदा उठा रहे हैं।

भारत एक लोकतंत्र है। लेकिन लोकतंत्र का मतलब ये नहीं कि हम अपने ही घर में सांप पालें।
समय आ गया है कि हम सवाल पूछें।
– क्या हम वाकई अपने देश में ऐसे लोगों को पनाह दे रहे हैं जो युद्ध की स्थिति में भारत के खिलाफ खड़े हो जाएँगे?
– क्या “मजहब” इनकी नजर में भारत से ऊपर है?

मैं इन कट्टरपंथी ताकतों को चेतावनी देता हूँ – भारत अब 2014 से पहले वाला भारत नहीं है।
जो लोग ईरान या फिलिस्तीन के लिए छाती पीटते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए – भारतीय सेना “शराबी” नहीं, बल्कि “शेर” है। और ये शेर अब जाग चुका है।

देशभक्ति चुनने का समय है।
या फिर साफ़-साफ़ बता दो – तुम्हारा वतन ईरान है या भारत?

जय हिंद।

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