हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। दिल्ली एयरपोर्ट के प्रार्थना कक्ष में भाजपा नेता कोम्पेला माधवी लता ‘दुर्गा सूक्तम’ का पाठ कर रही हैं। वहीं, कक्ष के एक कोने में कुछ मुस्लिम महिलाएं नमाज अदा कर रही हैं। यह दृश्य भारत की ‘सर्वधर्म समभाव’ वाली परंपरा का जीता-जागता उदाहरण होना चाहिए था, लेकिन इसने इस्लामी कट्टरपंथियों के उस चेहरे को उजागर कर दिया है, जिसे ‘सेक्युलर’ कहकर पोसने की कोशिश की जाती है।
आखिर समस्या क्या है? एक सार्वजनिक प्रार्थना कक्ष, जहाँ हर धर्म का व्यक्ति अपनी इबादत कर सकता है, वहाँ एक हिंदू महिला ने शांतिपूर्वक अपनी प्रार्थना की। उसने न किसी से एक शब्द कहा, न किसी की इबादत में बाधा डाली। फिर भी, ‘X’ (पूर्व ट्विटर) पर तथाकथित ‘मुस्लिम IT सेल’ और कुछ नामचीन हैंडलों में हड़कंप मच गया।
‘उत्पीड़न’ की झूठी दास्तान
आइए देखते हैं कि इन लोगों की ‘तकलीफ’ क्या है:
1. ‘द मुस्लिम’ नाम के हैंडल ने आरोप लगाया कि माधवी लता ने मुस्लिम महिलाओं को देखकर ही पूजा शुरू कर दी और उन्हें परेशान किया। यानी एक हिंदू महिला का अपने ईश्वर में विश्वास इतना ‘नाजुक’ है कि वह बिना मुसलमानों को देखे जागृत ही नहीं होता? क्या यह अहंकार नहीं है कि आप यह मान बैठें कि पूरी दुनिया आपके इर्द-गिर्द ही घूमती है? एक महिला ने अपनी आस्था के अनुसार प्रार्थना की, इसे ‘उत्पीड़न’ का नाम देना इस्लामी मानसिकता की सबसे बड़ी परवरिश है।
2. ‘हरुन खान’ नाम के यूजर ने कहा कि यह ‘उकसाने’ की कोशिश थी। सवाल यह है कि आखिर ‘दुर्गा सूक्तम’ का पाठ सुनकर आप भड़क क्यों जाते हैं? अगर एक धार्मिक स्तुति आपको ‘उकसावा’ लगती है, तो यह आपके धर्म की सहिष्णुता पर बड़ा सवाल है।
3. सबसे हास्यास्पद तर्क ‘अल फारसी’ नाम के यूजर का था, जिसने इसे ‘मुस्लिमों का उत्पीड़न’ बताया। भाई, उत्पीड़न वह होता है जब किसी की इबादत में जबरन रोक लगाई जाए, मस्जिदों को तोड़ा जाए, या लाउडस्पीकर हटा दिए जाएं। यहाँ तो एक महिला चुपचाप अपने कमरे में बैठकर पाठ कर रही थी। अगर यह उत्पीड़न है, तो देश की सड़कों पर, ट्रैफिक जाम करके, सार्वजनिक स्थानों पर की जाने वाली नमाज को क्या कहेंगे? वह ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ है और यह ‘उत्पीड़न’? यही दोहरा मापदंड इस्लामिक कट्टरपंथियों की पहचान है।
‘प्रार्थना कक्ष’ पर हक किसका?
नेटिज़न्स ने बिल्कुल सही सवाल उठाया है। दिल्ली एयरपोर्ट का प्रार्थना कक्ष केवल मुसलमानों के लिए नहीं है, यह हर धर्म के यात्री के लिए है। अगर वहाँ नमाज पढ़ी जा सकती है, तो दुर्गा सूक्तम का पाठ क्यों नहीं किया जा सकता?
एक ‘X’ यूजर अभिजीत मजूमदार ने ठीक ही कटाक्ष किया कि “दुर्गा स्तुति ने इन कीड़ों को कितना भड़का दिया है… इतनी सी दवा की दो बूँदें, और ये दर्द से चीखने लगते हैं।” यह सच है कि जब दूसरे धर्म के लोग अपने सीमित दायरे में पूजा करते हैं, तो इन्हें ऐतराज होता है, लेकिन दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर से होने वाली अज़ान और सड़कों पर होने वाली नमाज़ को ये ‘भारत की संस्कृति’ बता देते हैं।
एडवोकेट विनीत जिंदल का बयान भी काफी अहम है। उन्होंने कहा कि जब हिंदू निर्धारित स्थानों पर पूजा करते हैं, तो इन्हें आपत्ति होती है और ये खुद को पीड़ित दिखाने लगते हैं। यही ‘बेशर्म इस्लामी लोगों’ की मानसिकता है। यह कोई नई बात नहीं है। जब काशी-मथुरा में पूजा के अधिकार की बात होती है, तो यही लोग ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘माइनॉरिटीज’ का राग अलापते हैं, लेकिन जब एयरपोर्ट जैसी जगह पर कोई हिंदू महिला अपने अधिकार का इस्तेमाल करती है, तो वही लोग उसे ‘उत्पीड़न’ करार दे देते हैं।
माधवी लता: सिर्फ एक नेता नहीं, एक प्रतीक
कोम्पेला माधवी लता सिर्फ एक भाजपा नेता नहीं हैं, जिन्होंने हैदराबाद से असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। वह एक ऐसी हिंदू महिला का प्रतीक हैं, जो अपनी आस्था पर अडिग है। उन्होंने अपने ‘X’ अकाउंट पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “लोक कल्याण की ओर बढ़ने से पहले अपने अंदर की सफ़ाई और संतुलन ज़रूरी है।” उन्होंने अपनी श्रद्धा के अनुसार ‘ब्रह्माण्ड की माँ से ताकत’ ली।
यह उनका निजी और संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जिन लोगों को यह वीडियो खल रहा है, उन्हें एक बात समझ लेनी चाहिए: भारत में अब वह जमाना नहीं रहा, जहाँ केवल एक समुदाय को हर जगह अपनी इबादत की छूट हो और दूसरे को सार्वजनिक स्थान पर अपनी आस्था दिखाने के लिए भी ‘सेक्युलर’ सर्टिफिकेट लेना पड़े।
निष्कर्ष: ‘तुष्टिकरण’ की पराकाष्ठा
यह पूरा मामला ‘तुष्टिकरण’ की उस मानसिकता को उजागर करता है, जहाँ एक तरफ़ा सहिष्णुता को ही धर्मनिरपेक्षता मान लिया गया है। जब मुसलमान अपनी इबादत करते हैं, तो वह ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ है। जब हिंदू अपनी इबादत करते हैं, तो वह ‘उकसावा’ और ‘उत्पीड़न’ है।
नेटिज़न्स ने सही ही इन इस्लामी कट्टरपंथियों को घेरा है। प्रार्थना कक्ष पर सबका हक है, और जिन लोगों को किसी दूसरे धर्म की प्रार्थना से इतनी तकलीफ है, उन्हें पहले अपने धर्म की मूल शिक्षाओं में सहिष्णुता और अहिंसा का पाठ पढ़ना चाहिए। माधवी लता का यह वीडियो उन सबके लिए एक जवाब है, जो हिंदू आस्था को सार्वजनिक स्थानों पर गौण मानकर चलते हैं। हिंदू समाज अब न तो प्रार्थना कक्षों में पीछे हटेगा, न ही अपने अधिकारों से।
यह ‘सेक्युलर’ भारत का नया नियम है: समान अधिकार, समान अवसर, और किसी की भी धार्मिक भावनाओं को तुष्टिकरण का हथियार नहीं बनने दिया जाएगा।





