दहशतगर्दी का नया चेहरा:  कोई हेयर ट्रांसप्लांट कराकर ,कोई शेयर बाजार एक्सपर्ट बनकर तो कोई ‘पीर’ बनकर देश में आतंकी साजिश करता पाकिस्तानी आतंकी।

दहशतगर्दी का नया चेहरा:  कोई हेयर ट्रांसप्लांट कराकर ,कोई शेयर बाजार एक्सपर्ट बनकर तो कोई ‘पीर’ बनकर देश में आतंकी साजिश करता पाकिस्तानी आतंकी।

इस्लाम की सच्चाई हर दिन दुनिया के सामने आती ही रहती है लेकिन कुछ दिन पहले जब ये खबर पढ़ा तो आंखों में हैरानी नहीं हुई, बल्कि वही पुरानी कसैली सच्चाई महसूस हुई – ये लोग वही कर रहे हैं जो हमेशा से करते आए हैं: झूठ, धोखा,और आम आदमी को हथियार बनाकर उसे ही निशाना बनाना।

मैं एक एक्स मुस्लिम हूं और मैंने इस्लाम को तर्क के आधार पर छोड़ा। और जब मैं यह खबर पढ़ता हूँ कि आतंकी हेयर ट्रांसप्लांट और प्लास्टिक सर्जरी करवा रहे हैं, तो मेरा दिमाग सीधे उस मानसिकता पर जाता है जो मुझे मस्जिदों में बचपन में सिखाई गई थी – “काफिरों के बीच रहना है तो उनकी तरह बनो, लेकिन दिल से उन्हें धोखा दो।”

बहरूपिये की फितरत

लेख में लश्कर के आतंकी मोहम्मद उस्मान जट उर्फ ‘चाइनीज’ की कहानी पढ़कर मैं मुस्कुराए बगैर बिना नहीं रह सका। यह वही लोग हैं जो जन्नत के हूरों का वादा करके 14 साल के बच्चों को बम बाँधना सिखाते हैं, लेकिन खुद जब भारत आते हैं तो उनका सबसे बड़ा जिहाद अपने गंजे सिर पर बाल उगाना होता है। उस्मान का मिशन भारत में स्लीपर सेल बनाना था, लेकिन जब उसने कश्मीर में लोगों को शांति से जीते देखा तो उसे अहसास हुआ कि पाकिस्तान के कैंपों में उसे जो नफरत सिखाई गई, वह झूठ थी।

यही वह मोड़ है जहाँ इस्लामिक कट्टरता अपना पोल खोल देती है। दरअसल, जब ये ‘मुजाहिदीन’ असल जिंदगी देखते हैं – जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख एक साथ रोटी खाते हैं, शेयर बाजार में पैसा कमाते हैं, और एक-दूसरे की मदद करते हैं – तो उनका नफरत का ढाँचा हिल जाता है। यही वजह है कि बाद में वही आतंकी सूचनाएँ लीक कर देते हैं या फिर जीवन बदलने का दिखावा करते हैं।

टेक्नोलॉजी से धोखा

आतंकी अब AI कैमरों को चकमा देने के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवा रहे हैं। यानी, वो मॉडर्न इंडिया की तरक्की को ही अपना हथियार बना रहे हैं। 26/11 के मास्टरमाइंड साजिद मीर से लेकर आतंकी अब्दुल्ला उर्फ ‘अबू हुरैरा’ तक, जिसने यूट्यूब से शेयर ट्रेडिंग सीखी और सालों तक एक सफल व्यापारी बनकर रहा।

यहाँ मैं एक सवाल उठाना चाहूँगा: जब यही लोग पाकिस्तान में होते हैं तो वहाँ ‘गैर-मुस्लिम’ को सूदखोर कहकर उसका सिर काट देते हैं, लेकिन भारत आकर वही शेयर बाजार – जो सूद यानी Interest पर ही टिका है – को अपनी जेब भरने का माध्यम बना लेते हैं। क्या यह ‘तक़िया’ (इस्लामिक धोखेबाजी) नहीं है? वही ‘तक़िया’ जिसे मुफ्ती साहब मुसलमानों को ‘मजबूरी’ में करने की इजाजत देते हैं, लेकिन जब यही हम (Ex-Muslims) करें तो हमें ‘मुरतद’ कहकर मौत की सजा दे दी जाती है?

‘पीर’ का चोला और डॉक्टरों का जिहाद

सबसे दर्दनाक और खतरनाक हिस्सा यह है कि अब ये सिर्फ अनपढ़ गरीबों को भड़का नहीं रहे, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और पढ़े-लिखे लोग इस जाल में हैं। ‘अल फलाह मॉड्यूल’ के डॉ. उमर-उन-नबी जैसे लोग दिन में मरीजों की जान बचाते थे और रात में बम गिराने की साजिश रचते थे।

मैं खुद जानता हूँ कि कैसे मदरसों में पढ़ाया जाता है कि ‘दारुल हर्ब’ (गैर-इस्लामिक देश) के खिलाफ जिहाद सबसे बड़ा इबादत है। यह वही सोच है जिसने एक डॉक्टर को बम धमाका करने वाला बना दिया। और सबसे बड़ा मजाक यह है कि ये लोग आम हिंदू-मुस्लिम को नफरत फैलाने का दोष देते हैं, लेकिन खुद ही अपने ही धर्म के नाम पर एक पूरे देश को नरक बनाने की साजिश रचते हैं।

अंत में: असली खतरा कौन है?

पुलिस जब इन्हें पकड़ती है तो अक्सर इनके पास से AK-47, ग्रेनेड और भारी मात्रा में हथियार मिलते हैं। लेकिन मेरे लिए असली खतरा यह है कि अब भी हमारे समाज में कुछ लोग हैं जो इन आतंकियों को ‘शहीद’ की नज़र से देखते हैं। जब तक मस्जिदों के मिम्बरों से यह संदेश नहीं बदलेगा कि “भारत हमारी जन्नत है, न कि जिहाद का मैदान,” तब तक ये हेयर ट्रांसप्लांट और प्लास्टिक सर्जरी कराने वाले ‘बहरूपिये’ हमारे बीच पनपते रहेंगे।

एक Ex-Muslim होने के नाते मेरी यही इच्छा है कि इन आतंकियों का असली चेहरा – चाहे वह प्लास्टिक सर्जरी से छुपा हो या बढ़ी दाढ़ी के पीछे – एक दिन सबके सामने आ जाए। और हाँ, उस्मान जट को मेरी सलाह है: बाल तो उग आएंगे, लेकिन जो जहर तुम्हारे अंदर पाला गया है, उसे निकलवाने के लिए कोई हेयर ट्रांसप्लांट नहीं, बल्कि इंसानियत वाली सर्जरी चाहिए।

इस्लाम एक मानसिक बीमारी है। इसका इलाज सिर्फ तर्क और मानवता है, न कि सिर्फ स्कूल- कॉलेज।

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