इस बकरीद में कुछ ऐसा हुआ कि कुछ इस्लामिक इन्फ्लूएंसर के पेट में दर्द होने लगा है।
इस बकरीद पर सहर शेख, अदनान शेख (चीच्चा) और एजाज खान जैसे इन्फ्लुएंसर्स जो रोना-पीटना और विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं, वो मुझे बिल्कुल नया नहीं लग रहा। ये वही पुराना खेल है – जब कानून लागू हो तो “इस्लाम खतरे में” चिल्लाओ।
सड़क पर कुर्बानी = आजादी?
सरकार कह रही है – सड़क पर, सार्वजनिक जगहों पर जानवर मत काटो। स्वच्छता रखो, ट्रैफिक मत रोको, बच्चों के सामने खून-खराबा मत करो। ये कोई मुसलमानों पर अत्याचार नहीं, बल्कि बुनियादी सभ्यता है।
लेकिन ये इन्फ्लुएंसर्स इसे “मजहब की आजादी” का मुद्दा बना रहे हैं।
– अदनान शेख चैटजीपीटी का हवाला देकर कहते हैं कि 80% लोग नॉन-वेज खाते हैं तो मुसलमानों को क्यों रोका जाए? लेकिन वही अदनान हिंदू लड़की से शादी कर उसे इस्लाम में कन्वर्ट कर देते हैं। क्या वो लड़की की “आजादी” का भी रोना रोएंगे?
– एजाज खान तो सीधे “बदला लेंगे” की धमकी दे रहे हैं। लफड़ेबाजी,टीवी पर अशलीलता फैलाने ,ड्रग्स लेने और बेचने से फेमस इस शख्स को नॉन-वेज और वेज का फर्क नहीं पता, लेकिन मार-काट का तरीका अच्छा पता है।
– सहर यूनुस शेख मुंब्रा को हरे रंग में रंगने का सपना देखती हैं, लेकिन जब सवाल उठता है तो कहती हैं “मजहब की बात मत करो”। AIMIM की मेयर होने के नाते उनका पूरा वजूद मजहब पर टिका है, लेकिन कानून आया तो पीछे हट गईं।
ये लोग आम दिनों में “अल्लाहु अकबर” और कट्टर कंटेंट से पैसे कमाते हैं। लेकिन जैसे ही नियम आता है, “हम पीड़ित हैं” का नाटक शुरू।
मैंने जो देखा, वो ये इन्फ्लुएंसर्स छुपाते हैं
जब मैं मुसलमान था, तब बकरीद पर बकरों को खुले में काटते देखता था। खून की नदियाँ, चीखें, बच्चों का डरना – ये कुर्बानी के नाम पर निर्दोष और बेजुबान जानवरों पर क्रूरता थी।
ये लोग हिंदू त्योहारों पर प्रदूषण, पानी बर्बादी का रोना रोते हैं, लेकिन अपनी कुर्बानी पर सवाल उठे तो “इस्लामोफोबिया” चिल्लाते हैं। ये दोहरा मापदंड इस्लाम की सबसे बड़ी समस्या है – “एक नियम खुद के लिए, दूसरा गैर-मुस्लिमों के लिए”।
भारत सेकुलर देश है। यहां सबको बराबर अधिकार हैं, लेकिन विशेषाधिकार किसी को नहीं मिलने चाहिए। मुसलमानों को घर में, बंद जगह पर, नियमों के साथ कुर्बानी देने की पूरी छूट है। लेकिन सड़क पर खून बहाना, नालियों में बहाना – ये सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं।
एक्स-मुस्लिम होने का दर्द
मैंने इस्लाम छोड़ा , लेकिन आज भी खुद को खुल कर एक्स मुस्लिम नहीं बोल सकता क्योंकि इसकी सजा मैं जानता हूं और इसी बात का डर आज भी भारतीय मुसलमानों के दिमाग में बैठा है। ये इन्फ्लुएंसर्स वही डर फैलाते हैं – “इस्लाम खतरे में है” कहकर युवाओं को कट्टर बनाते हैं।
ये नकाब है। असलियत ये है कि ये लोग भारत को खाड़ी देशों में बदनाम करके फंडिंग और सपोर्ट हासिल करना चाहते हैं।
निष्कर्ष: सच्चाई का सामना करो
मैं हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – किसी के खिलाफ नहीं हूँ। लेकिन कट्टर इस्लामी विचारधारा के खिलाफ जरूर हूँ।
भारतीय मुसलमानों को चाहिए कि इन इस्लामिक इन्फ्लुएंसर्स का खेल समझें। कुर्बानी अल्लाह के नाम पर हो, लेकिन बच्चों के ट्रॉमा और सफाई की समस्या पैदा करके नहीं।
भारत में कानून सबके लिए एक समान होना चाहिए। हिंदुओं के त्योहारों पर सवाल उठ सकते हैं, तो मुसलमानों की कुर्बानी पर भी उठ सकते हैं। “विशेषाधिकार” की जिद छोड़ो, समान नागरिक संहिता की तरफ बढ़ो।
सच्ची कुर्बानी तो अंधविश्वास और कट्टरता की होनी चाहिए।
जय हिंद।





