नमस्कार दोस्तों,
मैं एक पूर्व मुस्लिम हूँ, और आज फिर से उसी दर्द को लिख रहा हूँ जो हर एक्स-मुस्लिम के दिल में बसता है। सलीम वास्तिक (या सलीम अहमद वास्तिक) पर 27 फरवरी 2026 को गाजियाबाद के लोनी में जानलेवा हमला हुआ। दो सगे भाई – जीशान और गुलफाम – ने उनके ऑफिस में घुसकर चाकू से उनकी गर्दन पर और पेट पर कुल 14 बार वार किए। सीसीटीवी में साफ दिखा – हेलमेट पहने, बिना नंबर प्लेट वाली बाइक से आए, और “सर तन से जुदा” का नारा लगाते हुए हमला किया। सलीम गंभीर रूप से घायल हुए, दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भर्ती रहे, लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह (नहीं, अब मैं कहता हूँ – शुक्र है भगवान) वो बच गए।
लेकिन असली कहानी मौत की नहीं, बल्कि “इंसानियत” के ड्रामे की है। दोनों हमलावरों का एनकाउंटर हो गया – जीशान पहले, गुलफाम 48 घंटे बाद। पुलिस पर फायरिंग करते पकड़े गए, इटली की पिस्टल मिली। UP पुलिस ने फटाफट कार्रवाई की, योगी सरकार का असर दिखा। लेकिन अब देखिए “पीड़ित” बनने का खेल –
उनके पिता बुनियाद अली का बयान:
“एनकाउंटर गलत था, कोर्ट में पेश करके जेल भेजते तो बेहतर होता।”
“जो आज बोया जा रहा है, उसके काँटे 20 साल बाद निकलेंगे… बच्चे डकैत बनेंगे।”
और सबसे क्रूर – “हुसैन ने भी 72 शहीदों को कंधा दिया था।” यानी अपने बेटों को शहीद घोषित कर दिया! सलीम की छटपटाहट, खून से लथपथ हालत पर एक आंसू नहीं।
गाँव वाले (अमरोहा के आसपास):
पड़ोसी रोते हुए – “बहुत नेक लड़के थे, कोई फॉल्ट नहीं।”
“पूरी बस्ती में रोजे में कुछ नहीं खाया।”
“एनकाउंटर गलत हुआ।”
सलीम पर हमले की खबर तक “नहीं सुनी”!
ये सब देखकर दिल टूटता है। एक आदमी ने इस्लाम छोड़ा, मदरसे की शिक्षा, महिलाओं के अधिकार, हलाला, जिहाद जैसी बातों पर सवाल उठाए – और उसे मुर्तद मानकर “शरिया” लागू करने की कोशिश। लेकिन हमलावर “नेक” और “शहीद”! क्यों? क्योंकि इस्लाम में उम्माह की एकता सबसे ऊपर है। कुरान (9:123) – काफिरों से लड़ो जो पास हैं। हदीस (बुखारी 6922) – मुर्तद की सजा मौत। सलीम उम्माह का दुश्मन बन गया, इसलिए उसकी जान लेना “जायज”।
दोनों भाई “मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर” टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े थे – वहाँ पाकिस्तानी यूट्यूबरों के वीडियो से ब्रेनवॉश, जिहादी मैसेज। सलीम ने हलाला पर कमेंट किया था तीन दिन पहले – बस यही ट्रिगर। ये जहर रोज फैल रहा है, लाखों युवा दिमाग में घुस रहा है।
मैं पूछता हूँ उन “मॉडरेट” मुसलमानों और सेकुलर लिबरल्स से जो एनकाउंटर पर रो रहे हैं:
– क्या गर्दन पर 14 चाकू के वार जायज थे?
– क्या हमलावरों के लिए आंसू बहाना इंसानियत है, जबकि पीड़ित एक्स-मुस्लिम की पीड़ा पर खामोशी?
– क्या मजहब की पहचान न्याय से बड़ी होनी चाहिए?
ये घटना सिर्फ एक हमला नहीं – ये संदेश है। अगर एक्स-मुस्लिम बनोगे, बोलोगे तो “नेक लड़के” भेज दिए जाएंगे। लेकिन योगी सरकार ने दिखा दिया – ऐसे जहर को बर्दाश्त नहीं। दोनों भाई 48 घंटे में खत्म। अब कोई सोचेगा दस बार हमला करने से पहले।
सलीम वास्तिक को सलाम। तुम बच गए, तुम्हारी आवाज और तेज होगी। एक्स-मुस्लिम कम्युनिटी डर नहीं मानेगी। हम जानते हैं – इस्लाम सुधारने लायक नहीं, क्योंकि समस्या रूट में है – कुरान और हदीस में।
जो सच्चाई जानना चाहते हो, कमेंट करो या मेरे चैनल पर आओ। डर मत, सच कड़वा है लेकिन आजादी देता है।
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जय हिंद।





