नमस्कार दोस्तों,
मैं एक पूर्व मुस्लिम हूं। सालों तक मैंने इस्लाम को “शांति का धर्म” समझा, लेकिन जब इतिहास की सच्ची किताबें खोलीं, तो पता चला कि “जिहाद” और “काफिरों का कत्ल” इस्लाम की मूल शिक्षाओं में कितना गहराई से बसा है। आज मैं आपको 1757 की उस काली घटना के बारे में बताता हूं, जब अफगान आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली ने मथुरा-वृंदावन में होली के मौके पर हजारों हिंदुओं का कत्लेआम किया। यह घटना सिर्फ युद्ध नहीं थी – यह धार्मिक नफरत और इस्लामी वर्चस्व की क्रूर मिसाल थी।
28 फरवरी 1757 – होली का उत्सव और खून की शुरुआत
मथुरा और वृंदावन में होली का रंग-बिरंगा त्योहार चल रहा था। लोग रंग खेल रहे थे, कृष्ण भक्ति में लीन थे, तीर्थयात्री इकट्ठा थे। लेकिन अहमद शाह अब्दाली की नजर इस पवित्र भूमि पर पड़ गई। उसने अपने सेनापति सरदार जहान खान को आदेश दिया – मथुरा-वृंदावन को पूरी तरह तबाह कर दो, क्योंकि ये “काफिरों” की पवित्र जगह है। अब्दाली का फरमान साफ था: “हिंदुओं की जगह को तलवार के घाट उतारो, आगरा तक कुछ भी न छोड़ो। हर कटे सिर पर 5 रुपये इनाम।”
जाट राजकुमार जवाहर सिंह ने 5000 योद्धाओं के साथ बहादुरी से मुकाबला किया। 9 घंटे तक लड़ाई चली, हजारों जाट वीर शहीद हुए। लेकिन अफगान सेना भारी पड़ गई। जैसे ही वे मथुरा में घुसे, नरसंहार शुरू हो गया। होली के रंग में खून मिल गया। सड़कें लाल हो गईं। अब्दाली के सैनिकों ने निर्दोष भक्तों, पुजारियों, महिलाओं और बच्चों को काट डाला।
क्रूरता की हदें – गाय के सिर से अपमान
सबसे घिनौनी बात यह थी कि साधुओं और बैरागियों को मारकर उनके गले में कटी हुई गाय का सिर लटका दिया जाता था, और मुंह में गाय का सिर लगाकर अपमान किया जाता था। यह इस्लामी विचारधारा का स्पष्ट प्रमाण था – जहां गाय को अपवित्र मानकर हिंदुओं के विश्वास को कुचला जाता था। यमुना का पानी 7 दिनों तक खून से लाल बहता रहा, फिर पीला हो गया। इतनी लाशें थीं कि बदबू फैल गई, रास्ते पहचानने मुश्किल हो गए।
वृंदावन में भी यही हुआ। लाशों के ढेर लगे, सिर काटकर इनाम के लिए इकट्ठे किए गए। महिलाओं के साथ बलात्कार, बच्चों को पोलो की तरह उछाला गया। अमीरों की संपत्ति लूटी गई, सुंदर महिलाओं को गुलाम बनाकर ले जाया गया। शहर में आग लगा दी गई, मंदिरों की मूर्तियां कुल्हाड़ी से तोड़ी गईं।
नागा साधुओं की वीरता – एकमात्र रोक
गोकुल पहुंचते-पहुंचते अब्दाली की सेना को नागा साधुओं ने रोक लिया। नंगे, त्रिशूलधारी साधुओं ने हजारों की संख्या में लड़ाई की। 2000 से ज्यादा साधु शहीद हुए, लेकिन उन्होंने अब्दाली की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अगर ये वीर न होते, तो गोकुल भी तबाह हो जाता। यह दिखाता है कि हिंदू कभी कमजोर नहीं थे – जब जरूरत पड़ी, तो उन्होंने तलवार उठाई।
इस्लाम की आलोचना – यह जिहाद था, युद्ध नहीं
दोस्तों, यह घटना सिर्फ अब्दाली की क्रूरता नहीं थी। यह इस्लाम के उस हिस्से का प्रमाण है जो “काफिरों” को मारने, उनके मंदिर तोड़ने और धर्म परिवर्तन कराने को जायज ठहराता है। कुरान में कई आयतें हैं जो जिहाद को बढ़ावा देती हैं, गैर-मुस्लिमों को नीचा दिखाती हैं। अब्दाली जैसे आक्रमणकारी इसी विचारधारा से प्रेरित थे। आज भी कई जगहों पर ऐसी सोच जिंदा है – जहां हिंदुओं को “काफिर” कहकर निशाना बनाया जाता है।
मैंने इस्लाम छोड़ा क्योंकि मैंने देखा कि यह “शांति” का नाम लेकर कितनी हिंसा फैलाता है। हिंदू धर्म में कोई जिहाद नहीं, कोई काफिर नहीं – सिर्फ मानवता और सहिष्णुता। लेकिन जब हिंदू सहिष्णुता दिखाते हैं, तो कुछ लोग इसे कमजोरी समझकर हमला करते हैं।
संदेश
आज होली मनाते वक्त याद रखें – हमारे पूर्वजों ने खून की होली देखी, लेकिन फिर भी त्योहार नहीं छोड़ा। हमारी संस्कृति जीवित है क्योंकि हमारी जड़ें मजबूत हैं। उन वीरों को नमन जो धर्म और मातृभूमि के लिए लड़े। और उन लोगों से सवाल पूछें जो आज भी “जिहाद” के नाम पर हिंसा फैलाते हैं।





