नमस्ते दोस्तों,
मैं बचपन से इस्लामी शिक्षाओं के बीच बड़ा हुआ। लेकिन जैसे-जैसे समझ बढ़ी, सवाल बढ़े। आज जब मैं अफगानिस्तान में तालिबान के नए फैमिली लॉ को देखता हूं, तो दिल में गुस्सा, दर्द और मायूसी का मिश्रण होता है। यह कानून सिर्फ तालिबान का नहीं, बल्कि इस्लामी फिक्ह (fiqh) की पारंपरिक व्याख्या का नतीजा है, जिसे वे “शरिया” कहकर लागू कर रहे हैं।
क्या है तालिबान का नया कानून?
तालिबान ने हाल ही में 31 आर्टिकल वाला “प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस” नाम का रेगुलेशन जारी किया है, जिसे उनके सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। सबसे विवादित प्रावधान यह है कि कुँवारी (वर्जिन) लड़की अगर निकाह के प्रस्ताव पर चुप रह जाए, तो उसकी चुप्पी को ही सहमति (consent) मान लिया जाएगा।
यह “खियार अल बुलूघ” (बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार) के नाम पर भी आता है, लेकिन यहां भी शर्त है – लड़की बालिग होने के बाद भी निकाह खत्म करने के लिए तालिबानी मजहबी अदालत की मंजूरी चाहिए। नाबालिग बच्चों के निकाह में अब्बा और दादा को पूरा अधिकार दिया गया है। अगर रिश्ता “सामाजिक रूप से उपयुक्त” और दहेज ठीक हो, तो बाल विवाह वैध माना जाएगा।
औरतों की निजी जिंदगी में तालिबान का दखल और बढ़ गया है – व्यभिचार, धर्म परिवर्तन, जिहार आदि मामलों में अदालत फैसला करेगी।
यह कोई नई बात नहीं है। यह इस्लामी परंपरा से आता है, जहां महिलाओं को अक्सर “ऑब्जेक्ट” की तरह देखा जाता रहा है – पिता/अभिभावक की संपत्ति, जिसका फैसला पुरुष करेंगे।
एक्स मुस्लिम होने के नाते मेरी बात
जब मैं मुसलमान था, तब भी महिलाओं के अधिकारों पर बहस सुनता था। कहते थे “इस्लाम ने महिलाओं को अधिकार दिए”। लेकिन हकीकत क्या है?
– कुरान और हदीस में बालिग होने से पहले निकाह की इजाजत है (Aisha का उदाहरण सबसे क्लासिक)।
– महिलाओं की गवाही आधा, विरासत आधा, और कई मामलों में पुरुषों की “कयूम्मत” (संरक्षकता)।
– चुप्पी को सहमति मानना? यह डर, दबाव और अज्ञानता पर आधारित जबरन निकाह को वैध बना देता है।
तालिबान इसे “शुद्ध इस्लाम” कह रहे हैं। और वे गलत नहीं हैं – यह उनकी किताबों और सलफी/देवबंदी/हनबली व्याख्या से मेल खाता है। समस्या यह है कि दुनिया के ज्यादातर मुसलमान इसे “कल्चर” या “एक्सट्रीमिज्म” कहकर अलग कर देते हैं। लेकिन जब तालिबान, ISIS, या सऊदी जैसे देश यही करते हैं, तो सवाल उठता है: मूल स्रोत में समस्या है या सिर्फ व्याख्या में?
अफगानिस्तान में 2021 के बाद लड़कियों की शिक्षा बंद, यूनिवर्सिटी बंद, काम बंद, अकेले बाहर निकलना मुश्किल। अब चुप्पी को हाँ मानकर उन्हें और ज्यादा कैद कर दिया गया। यह महिलाओं का इंसानियत से इंकार है।
भारतीय लिबरल गैंग की चुप्पी
सबसे हैरानी की बात भारतीय “लिबरल”, “सेकुलर” और “फेमिनिस्ट” इस्लामी अकाउंट्स की खामोशी है।
भारत में CAA, Triple Talaq, Uniform Civil Code या किसी भी हिंदू मुद्दे पर इनकी आवाज गूंजती है। लेकिन जब मुस्लिम देशों में महिलाओं पर अत्याचार होता है – पाकिस्तान में ब्लास्फेमी लॉ, ईरान में हिजाब विरोध पर गोली, अफगानिस्तान में यह नया कानून – तब ये चुप।
क्यों? क्योंकि उनकी “प्रोग्रेसिविज्म” चुनिंदा है। यह इस्लामोफोबिया के डर से या वोट बैंक पॉलिटिक्स से उपजा है। असली नारीवाद तो सबके लिए होता है – चाहे वो हिंदू हो, मुस्लिम हो या एक्स-मुस्लिम।
निष्कर्ष: सुधार की जरूरत
मैं एक्स-मुस्लिम हूं, इसलिए कह सकता हूं – इस्लाम में महिलाओं की स्थिति 7वीं सदी में भी जहन्नुम थी, और आज के 21वीं सदी में भी यह जेलखाना बन चुकी है।
तालिबान का यह फरमान मानवाधिकारों का उल्लंघन है। दुनिया को आवाज उठानी चाहिए। मुस्लिम समाज को सुधार की जरूरत है या उसे छोड़ कर बाहर आने की। इस्लाम की literalist व्याख्याओं से हटकर, तर्क, science और individual rights को प्राथमिकता देने की।
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जय हिंद, जय इंसानियत





