15 मई 2026 को कोलकाता के राजा बाजार में जो हुआ, वह कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह इस्लामिक मानसिकता का जीता-जागता सबूत था, जिसमें सड़कें अपनी नहीं, बल्कि अल्लाह की मानी जाती हैं। पुलिस ने सड़क खाली कराने की कोशिश की तो नारेबाजी, हंगामा और “अल्लाहु अकबर” के नारे गूंज उठे। नई BJP सरकार के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के सख्त आदेश के बावजूद मुस्लिम भीड़ सड़क पर नमाज पढ़ने पर अड़ी रही। यह घटना भारत में लंबे समय से चल रही “सड़क जिहाद” की निरंतरता है।
सड़क पर नमाज क्यों? क्या मस्जिदें कम पड़ रही हैं?
इस्लाम में जुमे की नमाज सामूहिक होती है और बड़े पैमाने पर होती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब मस्जिदों की क्षमता से ज्यादा लोग आ जाते हैं और सड़कें, फुटपाथ, यहां तक कि हाईवे भी कब्जा कर लिए जाते हैं। राजा बाजार में भी यही हुआ। सालों से ममता बनर्जी के तुष्टिकरण वाले राज में यह सब “धर्म की आजादी” के नाम पर चलता रहा। ट्रैफिक रुकता, आम नागरिक परेशान होते, एंबुलेंस फंसती, लेकिन कोई नहीं बोलता था। जबकि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मस्जिदें भारत में है।
अब जब नई सरकार कह रही है – सड़क किसी की जागीर नहीं, धार्मिक कार्यक्रम मस्जिद-मंदिर के अंदर हों – तो हंगामा मच गया। यह दर्शाता है कि कुछ समुदायों को “विशेष अधिकार” की आदत पड़ चुकी है। वे सोचते हैं कि शरीयत कानून ऊपर है, भारतीय संविधान नीचे। सड़क पर नमाज पढ़ना “इबादत” नहीं, बल्कि **प्रदर्शन** और **क्षेत्र कब्जाने** का तरीका बन गया है।
इस्लामिक सुप्रीमेसी का सबूत
कुरान और हदीस में काफिरों की जमीन को “दर-उल-हरब” (युद्ध का क्षेत्र) माना जाता है, जिसे इस्लामिक नियमों के तहत लाना लक्ष्य है। सड़कें बंद करके नमाज पढ़ना इसी मानसिकता का नतीजा है। दुनिया भर में देखें – फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी – जहां मुस्लिम आबादी बढ़ी, वही सड़क नमाज की समस्या बढ़ी। भारत में तो यह पुरानी परंपरा है।
जब पुलिस सख्ती दिखाती है तो चिल्लाते हैं “इस्लामोफोबिया” और “अत्याचार”। लेकिन सवाल यह है – अगर हिंदू या सिख सड़क पर पूजा-पाठ शुरू कर दें तो क्या यही सहनशीलता दिखेगी? जवाब है नहीं। क्योंकि यह “एकतरफा सेकुलरिज्म” है।
सुवेंदु अधिकारी की सरकार की सराहना
नई सरकार का फैसला सराहनीय है। लाउडस्पीकर पर रोक, सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक कब्जे पर सख्ती – यह असली समान कानून (Uniform Civil Code की दिशा में) की शुरुआत है। पुलिस ने CRPF के साथ मिलकर इलाका खाली कराया, जो सही कदम था। कानून हाथ में लेने वालों की पहचान कर कार्रवाई होनी चाहिए।
मुस्लिम समुदाय को समझना चाहिए:
– मस्जिदों का विस्तार करो या छोटे-छोटे हॉल बनाओ।
– घर पर या उपलब्ध जगह पर नमाज पढ़ो।
– सड़क आम आदमी की है, अल्लाह की नहीं।
निष्कर्ष: सुधार का समय आ गया है
यह घटना सिर्फ कोलकाता की नहीं, पूरे भारत की है। जहां भी मुस्लिम बहुल इलाके हैं, यही समस्या है। इस्लाम में “फितना” (अराजकता) फैलाने की बजाय शांति और कानून का सम्मान करना सीखना होगा। अगर हर जुमे को सड़क जाम करना “धर्म” है, तो फिर इस “धर्म” पर सवाल उठाना जरूरी है।
भारत सेकुलर देश है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एक समुदाय पूरे शहर को अपने हिसाब से चला ले।
सड़क पर नमाज बंद होनी चाहिए, पूर्ण रूप से। यह ना सिर्फ यातायात का मुद्दा है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सभ्य समाज का मुद्दा है।
जय हिंद।





