जब मैं बच्चा था, मदरसों और जुमे के खुत्बों में सिखाया जाता था कि जिहाद के रास्ते पर चलने वालों की मौत “शहादत” है — और शहीद का दर्जा किसी बादशाह से कम नहीं। मौत को इतना रोमांटिक बना दिया जाता था कि लड़के जन्नत की हूरों के सपने देखने लगते थे।
लेकिन इस्लामाबाद की कूबा मस्जिद के गेट पर 8 अगस्त 2026 को जो हुआ, उसे देखकर उस बचपन का हर वादा कितना खोखला लगता है।
घटना: नमाज़ के लिए निकला, मस्जिद के दरवाज़े पर ही गिर पड़ा
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का वरिष्ठ कमांडर कारी सईद अब्दुल अज़ीज़ अचानक गिरकर मर गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक वह कूबा मस्जिद में नमाज़ पढ़ने पहुँचा था, लेकिन मस्जिद के गेट पर ही लड़खड़ाकर गिर पड़ा। मौजूद लोगों ने उसे संभालने की कोशिश की, CPR दिया, फिर अस्पताल ले जाया गया — जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
सबसे दिलचस्प — और सबसे संदेहास्पद — विवरण यह है कि वह मस्जिद पहुँचने से पहले किसी “अनजान जगह” पर खाना खाकर आया था। वुजू करने के बाद वह बैग लेकर मुख्य नमाज़ की तरफ़ बढ़ रहा था, जूते उतारने बैठा, और अचानक ज़मीन पर गिर गया। मौत की वजह अब तक साफ़ नहीं है — बीमारी, मेडिकल इमरजेंसी, या कुछ और। पाकिस्तान में, जहाँ “अनजान बंदूकधारी” रोज़ आतंकियों को मार रहे हैं, वहाँ “अनजान ढाबे का खाना” भी अब मौत की वजह बन सकता है।
“शहीदों के वारिस” का विभाग: मौत का धंधा जो पेंशन देता है
कारी सईद कोई मामूली आतंकी नहीं था। वह लश्कर के शोबा-ए-वारसा-ए-शुहदा (शहीदों के वारिस विभाग) की दक्षिण पंजाब यूनिट की ज़िम्मेदारी संभालता था। यह वह विभाग है जो भारत में मुठभेड़ों में मारे गए आतंकियों के परिवारों से संपर्क रखता है और उन्हें मासिक पेंशन और आर्थिक सहायता देता है।
इस एक वाक्य में पूरा दर्द समाया है। भारत के जवान रोज़ अपनी जान देते हैं ताकि देश सुरक्षित रहे — और पाकिस्तान में बैठे लोग उन जवानों को मारने वालों के परिवारों को “पेंशन” देते हैं। यह शहादत का धंधा है, जिसमें मौत को महिमामंडित किया जाता है ताकि अगली पीढ़ी भी उसी रास्ते पर चले। मैंने अपनी ज़िंदगी में यह देखा है — कैसे ग़रीब परिवारों के लड़कों को “शहीद” बनने का सपना दिखाकर मौत की तरफ़ भेजा जाता है, और फिर उस मौत को “कुर्बानी” बताकर जश्न मनाया जाता है।
सिर्फ़ एक मौत नहीं, एक पैटर्न है: “अनजान बंदूकधारी” कौन?
कारी सईद की मौत ऐसे वक़्त हुई है जब लश्कर का ही एक और कमांडर रिज़वान हनीफ वीडियो जारी करके दावा कर रहा था कि पिछले तीन-चार सालों में 30 से ज़्यादा लश्कर आतंकी पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में मारे गए हैं — पेशावर, कराची, रावलपिंडी, मुज़फ़्फ़राबाद और रावलाकोट में। उसने इन मौतों के लिए बिना किसी सबूत के भारतीय खुफिया एजेंसियों पर आरोप लगाया।
यह “अनजान बंदूकधारी” वाला नैरेटिव अब पाकिस्तान का सबसे बड़ा अंधेरा है। कभी कहा जाता था कि ये मौतें भारत की कार्रवाई हैं, तो कभी आंतरिक रंजिश। सच यह है कि जिहादी इकोसिस्टम खुद अपनी ही औलाद को निगल रहा है — लश्कर, जैश, TTP, ISIS खुरासान… एक-दूसरे के खून के प्यासे। और जब भीतर का हाल बेहाल होता है, तो बाहर का दुश्मन — भारत — खड़ा कर दिया जाता है। यह वही मानसिकता है जो किसी भी समुदाय को आत्मचिंतन से बचाती है: अपनी ग़लती कभी नहीं दिखती , दिखती है हमेशा दूसरों की “साज़िश”।
ऐसी ही कुछ घटनाएँ — जिन्हें पाकिस्तानी मीडिया भी नहीं छिपा सका
यह पहली बार नहीं है। पिछले डेढ़ साल में ही ऐसे कई लश्कर कमांडर मारे गए हैं, जिनकी मौतें “रहस्यमय” कही गईं:
अबू सैफुल्लाह खालिद (रज़ाउल्लाह निज़ामानी) — 18 मई 2025 को सिंध प्रांत में तीन अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। यह वही आतंकी था जो 2006 में नागपुर के RSS मुख्यालय पर हमले का मास्टरमाइंड माना जाता था। मज़ेदार बात यह है कि उसे पाकिस्तानी झंडे में लिपटे ताबूत में दफ़नाया गया — जिसने भारत पर हमले की साज़िश रची, उसे पाकिस्तान ने अपना “शहीद” बना लिया।
बिलाल आरिफ़ सलाफ़ी — जून 2025 में ईद की नमाज़ के तुरंत बाद, मुरीदके स्थित मारकज़-ए-तैयबा (लश्कर का मुख्यालय) के अंदर ही अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर और चाकू घोंपकर हत्या कर दी। सोचिए — वह मुख्यालय जहाँ से कश्मीर में आतंक फैलाने की योजनाएँ बनती हैं, वहाँ घुसकर कमांडर को मारा जाए और किसी को पता न चले। कुछ रिपोर्ट्स ने तो यहाँ तक कहा कि “परिवार के लोगों” ने उसे मारा — मानो परिवार ही ज़िम्मेदार हो। यह वही पुराना हथकंडा है: असली सवालों से ध्यान हटाने के लिए किसी और पर इल्ज़ाम। जब हत्यारों का पता नहीं चलता, तो कहानी बदल दी जाती है।
शेख़ यूसुफ़ अफ़रीदी — लश्कर का कमांडर, ख़ैबर (Khyber) में अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
और अब कारी सईद अब्दुल अज़ीज़ — मस्जिद के गेट पर, नमाज़ के लिए जाते वक़्त, “अनजान खाने” के बाद।
एक्स-मुस्लिम की नज़र से: यह “शहादत” नहीं, बर्बादी है
मैंने इस्लाम छोड़ा, लेकिन जिहादी नैरेटिव को करीब से देखा है। मुझे याद है, कैसे इन लोगों को हीरो बनाकर पेश किया जाता था — “अल्लाह के शेर”, “उम्मत के रहनुमा”। लेकिन सच यह है कि इनमें से ज़्यादातर लड़के ग़रीबी, अज्ञानता और मज़हबी ब्रेनवॉशिंग का शिकार होते हैं। उन्हें सिखाया जाता है कि मौत के बाद जन्नत है, जिसके लिए वे मरते हैं — कभी किसी दूसरे देश की सरज़मीं पर बेगुनाहों को मारते हुए, तो कभी अपने ही देश की गलियों में “अनजान बंदूकधारियों” के हाथों।
पाकिस्तान का दावा है कि उसने लश्कर पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन लश्कर का मुख्यालय मुरीदके में खुला चलता है, उसके कमांडर मस्जिदों में आज़ादी से नमाज़ पढ़ते हैं, और वह भारत में मारे गए आतंकियों के परिवारों को पेंशन बाँटता है। प्रतिबंध सिर्फ़ कागज़ों पर है — क्योंकि आतंक पाकिस्तान की नीति है, हालाँकि अब यही नीति उसके अपने ही घर को जला रही है।
और सबसे बड़ी विडंबना: मस्जिद — जिसे “अल्लाह का घर” कहा जाता है — जिहादियों के लिए कभी पनाहगाह रही है। अफ़ग़ानिस्तान से लेकर सीरिया तक, मस्जिदों से जिहाद का एलान होता रहा है। और अब इस्लामाबाद की मस्जिद के दरवाज़े पर ही एक लश्कर कमांडर मरा पड़ा है। न कोई फ़रिश्ता बचाने आया, न “शहादत” का कोई चमत्कार। सिर्फ़ एक लाश, कुछ सवाल, और एक “सस्पेंस” ख़बर।
बिना सबूत के इल्ज़ाम: आत्मचिंतन से बचने की सबसे पुरानी चाल
रिज़वान हनीफ़ का आरोप — “भारत ने हमारे 30 लोग मारे” — बिना एक भी सबूत के है। कोई नाम नहीं, कोई ऑपरेशन का विवरण नहीं, कोई फोरेंसिक नहीं। सिर्फ़ एक आरोप, ताकि पाकिस्तान के भीतर जिहादियों की आपसी लड़ाई, सुन्नी-सलाफ़ी रंजिशें, और सुरक्षा तंत्र की नाकामी छिप जाए।
यह वही पैटर्न है जो मैंने अपने समुदाय में बार-बार देखा है: जब भीतर से कुछ टूटता है, तो बाहर का दुश्मन खड़ा किया जाता है। अपनी ग़लतियों पर सवाल उठाना मना है, इसलिए हर विफलता “साज़िश” बन जाती है। लेकिन सच यह है कि आतंकवाद का ज़हर उसी समाज को खा रहा है जिसने उसे पाला। 30 लश्कर आतंकियों की मौत पर अगर किसी से सवाल करना है, तो सबसे पहले उन नेताओं से जिन्होंने उन्हें हथियार दिए, उन मौलवियों से जिन्होंने उन्हें जन्नत का वादा किया, और उस व्यवस्था से जो आतंक को अपनी विदेश नीति का औज़ार बनाती है।
निष्कर्ष
कारी सईद अब्दुल अज़ीज़ की मौत “रहस्यमय” हो सकती है, लेकिन उसके पीछे का सच बिल्कुल रहस्यमय नहीं है। जो व्यवस्था मौत को “शहादत” बेचती है, वही व्यवस्था अपने ही लोगों की मौत पर “सस्पेंस” बनाती है। भारत के लिए यह ख़बर संतोष की नहीं, बल्कि सतर्कता की है — क्योंकि आतंकी मरते हैं, लेकिन आतंक का इकोसिस्टम नहीं मरता। वह बस नए चेहरों में बदल जाता है, नए मदरसों में पलता है, और नई पीढ़ी को “शहादत” का सपना दिखाता है।
मेरे लिए, एक एक-मुस्लिम के तौर पर, यह घटना एक और सबक है: धर्म के नाम पर मौत को महिमामंडित करने वाली हर कहानी पर सवाल उठाना ज़रूरी है — चाहे वह कहानी पाकिस्तान में कही जाए या भारत में। क्योंकि मौत मौत है। उसे “शहादत” का लिबास पहनाकर बर्बादी को धर्म नहीं बनाया जा सकता।
स्रोत (Source Links)
NDTV: Lashkar Commander Found Dead At Islamabad Mosque
WION: Lashkar commander dies ‘mysteriously’ at Islamabad mosque entrance
Newsonair: Mastermind of 2006 RSS HQ Attack Abu Saifullah Khalid Shot Dead in Pakistan
India Today: Who was Saifullah Khalid, LeT’s elusive shadow commander
DNA India: LeT commander Bilal Arif Salafi shot and stabbed inside Markaz Taiba
नोट: इस लेख में दिए गए तथ्य उपरोक्त समाचार रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। विश्लेषण लेखक का निजी दृष्टिकोण है।
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