सोशल मीडिया पर इन दिनों जो वीडियो वायरल हो रहा है, उसे देखकर हैरत होती है कि ये भारत है या पाकिस्तान। गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित जयपुरिया मॉल में मंगलवार (4 अगस्त 2026) को एक युवक ने हाथ में बड़ा सा चाकू लहराते हुए एक युवती पर हमला करने की कोशिश की। वीडियो में वह लड़की को ज़मीन पर गिराकर थप्पड़ों की बरसात करता दिख रहा है। बेचारी किसी तरह भागकर अपनी जान बचा पाई।
एक भारतीय एक्स मुस्लिम होने के नाते इस वीडियो को देखकर मेरे मन में दोहरा दर्द है — एक इंसान के तौर पर, और एक ऐसे शख्स के तौर पर जो उसी समाज से आया है, जिसकी छवि का यह वीडियो एक और काला अध्याय बन गया है। यह ब्लॉग उसी दोहरे दर्द की बयानी है।
क्या हुआ था — रिपोर्ट के तथ्य
ऑपइंडिया हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना जयपुरिया मॉल के कैलिफोर्निया बुरिटो रेस्टोरेंट के बाहर हुई, जहाँ पीड़िता काम करती है। आरोपी युवक भी उसी मॉल में कहीं और काम करता है। दोनों दो साल पहले नोएडा सेक्टर-62 की एक फैक्ट्री में साथ काम करते थे।
बताया जा रहा है कि रेस्टोरेंट में काम के दौरान युवती की दोस्ती एक दूसरे कर्मचारी से हो गई — और इसी बात से आरोपी को आग लग गई। मंगलवार को वह उसके रेस्टोरेंट में पहुँचा, किचन से चाकू उठाया, युवती को डराने-धमकाने लगा और फिर उसकी पिटाई कर दी। वहाँ मौजूद किसी व्यक्ति ने पूरी घटना रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर डाल दी। घटना की सूचना शाम करीब 8 बजे वायरल वीडियो के ज़रिए पुलिस तक पहुँची, जिसके बाद पुलिस आयुक्तालय (गाजियाबाद) ने तुरंत संज्ञान लेकर जाँच शुरू की। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया है और उससे पूछताछ कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, सबूतों के आधार पर संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सोशल मीडिया पर आरोपी का नाम ‘साजिद’ बताया जा रहा है — हालाँकि यह पुलिस की आधिकारिक पुष्टि से पहले की रिपोर्ट है।
पहला सवाल: ये ‘मोहब्बत’ है या मलिकियत?
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आरोपी को लगा कि उसे हक़ है — हक़ है कि वह किसी लड़की की ‘ज़िंदगी की मालिकाना’ रखता है। लड़की ने किसी और से दोस्ती कर ली, तो यह उसके लिए इतना बड़ा अपमान था कि उसने चाकू उठा लिया। यह कोई ‘मोहब्बत’ नहीं है, यह एक पुरानी, बीमार मानसिकता है — जिसमें औरत को इंसान नहीं, ‘इज़्ज़त की निशानी’ और ‘संपत्ति’ माना जाता है। जिस दिन उसे लगता है कि ‘उसकी चीज़’ पर किसी और की नज़र पड़ी, वह हिंसा पर उतर आता है।
यह मानसिकता उस मज़हब की है — जहाँ पुरुषों को बचपन से सिखाया जाता है कि औरतें उनकी ‘अमानत’ हैं। लेकिन जब यही मानसिकता मज़हब के नाम पर पवित्र कर दी जाती है, जब ‘ग़ैरत’, ‘इज़्ज़त’ और ‘बेटी की रक्षा’ जैसे शब्दों के पीछे छिपकर पुरुष की ज़्यादती को जायज़ ठहराया जाता है, तब समस्या और गहरी हो जाती है।
दूसरा सवाल: जुर्म का रंग और ‘इस्लामोफोबिया’ का तमाशा
अब आता है वह हिस्सा जो मुझे सबसे ज़्यादा तकलीफ देता है। जब कभी किसी मुस्लिम आरोपी की वीडियो सामने आती है, तो एक खाश तरह के लोग तुरंत सामने आ जाते हैं। जो किसी भी मुस्लिम आरोपी की बेगुनाही साबित करने में जुट जाते हैं — ‘इस्लामोफोबिया’ का रोना रोते हैं, ‘फंसाया गया’ कहते हैं, वीडियो को ‘एडिटेड’ बताते हैं।
मैं एक एक्स मुस्लिम हूँ। मैंने उस समाज के अंदर से देखा है कि कैसे बिरादरी की ‘इज़्ज़त’ के नाम पर औरतों को चुप कराया जाता है, कैसे किसी मुस्लिम आरोपी के खिलाफ सबूत होने पर भी पहले ‘मज़हबी एकता’ की दुहाई दी जाती है। कितने ही मामले देखे हैं जहाँ मुस्लिम औरत पर ज़ुल्म होता है और वही ‘रखवाले’ चुप रहते हैं — क्योंकि आरोपी ‘हमारा अपना’ होता है। लेकिन जैसे ही कोई हिंदू पीड़िता होती है और आरोपी मुस्लिम, तो उसी समुदाय के ‘बुद्धिजीवी’ अचानक बहुत ‘निष्पक्ष’ हो जाते हैं — न्याय की जगह साज़िश तलाशने लगते हैं ।
मेरा दर्द यह है कि मैं उस समुदाय से आया हूँ, और मैं जानता हूँ कि यह पाखंड कितना गहरा है। मैं उस ‘सच्चाई’ को नकार नहीं सकता जो वीडियो में दिख रही है — एक युवक चाकू लिए एक युवती को पीट रहा है। यह किसी ‘इस्लामोफोबिया’ की फिल्म नहीं है, यह रियल लाइफ का सीसीटीवी जैसा वीडियो है, जिसे वहाँ मौजूद एक आम इंसान ने रिकॉर्ड किया है।
एक एक्स मुस्लिम का दोहरा दर्द
लोग अक्सर पूछते हैं कि आपने अपना मज़हब क्यों छोड़ा? मैं आमतौर पर कानूनी अधिकारों और विचार की आज़ादी की बात करता हूँ। लेकिन इस वीडियो के बाद मैं एक और जवाब जोड़ सकता हूँ: क्योंकि मैं उस व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना चाहता जो किसी लड़की के खिलाफ चाकू उठाने वाले को भी ‘भाई’ कहकर बचाने की कोशिश करे। जब मैं मुस्लिम था, तो भी मुझे यह बुरा लगता था कि जुर्म का जिक्र होते ही ‘पूरे समुदाय को बदनाम मत करो’ की चिंता सबसे पहले आती है — पीड़िता के आँसू बाद में। एक एक्स मुस्लिम होने के नाते मैं यह कहने का हक़ रखता हूँ कि यह प्राथमिकता ही गलत है।
और हाँ, मैं उन लोगों को भी जवाब देना चाहता हूँ जिस समाज की ‘संस्कृति’ में ऐसे आदमियों को पनपने की जगह मिलती है, उसे आईने में देखना होगा।
कानून का रास्ता
इस मामले में पुलिस ने जिस तत्परता से वीडियो का संज्ञान लिया और आरोपी को हिरासत में लिया, वह सराहनीय है। अब उम्मीद है कि मामला सबूतों के आधार पर संबंधित धाराओं में दर्ज होगा और दोषी को कानून के मुताबिक सज़ा मिलेगी। चाकू लहराकर किसी को डराना, किसी पर हमला करना — यह किसी भी सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं होना चाहिए, चाहे आरोपी किसी भी धर्म का हो।
अंत में
मैं इस लड़की के साथ खड़ा हूँ — बिना किसी शर्त के। उसके धर्म की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि वह एक इंसान है, जिस पर ज़ुल्म हुआ। और मैं उस समुदाय के हर उस इंसान से भी पूछना चाहता हूँ जो मुझसे पूछता है कि मैंने इस्लाम क्यों छोड़ा: जब आपके ‘अपनों’ में से कोई किसी औरत पर चाकू उठाता है, तो आप पहले पीड़िता के लिए खड़े होते हैं या ‘बिरादरी की इज़्ज़त’ के लिए? आपका जवाब ही मेरे सवाल का जवाब है।
अस्वीकरण: उपरोक्त तथ्यात्मक जानकारी ऑपइंडिया हिंदी की रिपोर्ट (5 अगस्त 2026) और गाजियाबाद पुलिस आयुक्तालय के आधिकारिक ट्वीट (4 अगस्त 2026) पर आधारित है। आरोपी का नाम सोशल मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है; पुलिस की आधिकारिक पुष्टि और अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी लंबित हैं। बाकी विश्लेषण लेखक का निजी मत है।





