नमस्कार दोस्तों, मैं एक एक्स मुस्लिम हूँ, जो इस्लाम की कट्टरता और उसकी कुरीतियों से तंग आकर इस मजहब से बाहर निकला हूँ। आज मैं आपके सामने एक ऐसी घटना पर बात करने जा रहा हूँ, जो न सिर्फ एक व्यक्ति की जिंदगी पर हमला है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक खतरे की घंटी है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एक्स-मुस्लिम सलीम वास्तिक पर हुए जानलेवा हमले ने फिर से साबित कर दिया कि इस्लामी कट्टरपंथी कितने खतरनाक तरीके से सोशल मीडिया और विदेशी ताकतों के जरिए फैल रहे हैं। यह हमला कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि एक संगठित साजिश का नतीजा है, जिसमें टेलीग्राम ग्रुप्स, पाकिस्तानी उकसावा और ‘सर तन से जुदा’ जैसी सोच शामिल है। आइए, इस घटना को गहराई से समझते हैं और देखते हैं कि कैसे इस्लाम की आड़ में हिंसा को जायज ठहराया जा रहा है।
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हमले की पृष्ठभूमि: सलीम वास्तिक कौन हैं?
सलीम वास्तिक एक बहादुर एक्स-मुस्लिम हैं, जो इस्लाम की कुरीतियों और मजहबी कट्टरता के खिलाफ खुलकर आवाज उठाते हैं। वे उन लाखों लोगों की तरह हैं, जो इस मजहब की सच्चाई को समझकर इससे बाहर निकल चुके हैं। लेकिन कट्टरपंथी ताकतें ऐसे लोगों को बर्दाश्त नहीं करतीं। वे उन्हें ‘मुर्तद’ (धर्मत्यागी) कहकर मौत की सजा देने की बात करती हैं। सलीम पर हमला करने वाले जीशान और गुलफाम, जो सगे भाई हैं, इसी सोच से प्रेरित थे। ये दोनों अमरोहा के रहने वाले कारपेंटर थे, लेकिन सोशल मीडिया के जहर ने इन्हें हत्यारे बना दिया।
जाँच से पता चला कि हमलावर ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ नामक एक टेलीग्राम ग्रुप से जुड़े थे। यह ग्रुप करीब 18,200 सदस्यों वाला है, जहाँ कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दिया जाता है। हमले के बाद इसी ग्रुप पर सलीम की घायल तस्वीरें शेयर की गईं और सदस्यों ने जश्न मनाया। एक पोस्ट में लिखा था, “एक्स मुस्लिम सलीम को अस्पताल पहुँचा दिया गया है, पूरा वीडियो चाहिए?” यह कितना घिनौना है! क्या यही है इस्लाम का ‘शांति का संदेश’? एक पूर्व मुसलमान के रूप में मैं कहता हूँ कि यह सोच कुरान और हदीसों में मौजूद ‘मुर्तदों’ के लिए मौत की सजा से ही आती है।
पाकिस्तान कनेक्शन: विदेशी उकसावा और सोशल मीडिया का जाल
इस घटना में पाकिस्तान का हाथ साफ दिखाई देता है। एक पाकिस्तानी यूट्यूबर ने खुलेआम सलीम और अन्य हिंदूवादी नेताओं को मारने की धमकी दी थी। उसके वीडियो वायरल हुए, जिनमें सीधे हत्या के लिए उकसाया गया। जीशान और गुलफाम इसी से प्रभावित हुए। जीशान खुद एक यूट्यूब चैनल चलाता था और कट्टरपंथी ग्रुप्स से जुड़ा था। हमले के बाद उन्होंने टेलीग्राम पर फोटो पोस्ट कर जिम्मेदारी ली और जश्न मनाया।
यह नेक्सस सिर्फ टेलीग्राम तक सीमित नहीं है। ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी’ जैसे ग्रुप्स इस्लामी कट्टरता का जाल फैला रहे हैं, जहाँ ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे आम हैं। उदयपुर के कन्हैया लाल और लखनऊ के कमलेश तिवारी की हत्याओं से मिलता-जुलता यह हमला दिखाता है कि कैसे वैचारिक मतभेद को हिंसा से दबाया जाता है। रमजान और जुमे के दिन को चुनना भी साजिश का हिस्सा था, ताकि इसे मजहबी रंग दिया जा सके। हमलावर सलीम का पीछा करते हुए नमाज वाली जगह तक गए और फिर कार्यालय पर गले पर धारदार हथियार से वार किया। मंशा साफ थी – सिर धड़ से अलग करना। शुक्र है कि शोर मचने से वे भाग निकले।
इस्लामी कट्टरता की जड़ें: मेरी नजर में
एक एक्स-मुस्लिम के तौर पर मैंने खुद इस मजहब की सच्चाई देखी है। इस्लाम में ‘मुर्तदों’ के लिए मौत की सजा का प्रावधान है, जो आज भी कई देशों में लागू है। सोशल मीडिया ने इसे और आसान बना दिया है। पाकिस्तान जैसे देशों से आने वाले उकसावे भारतीय मुसलमानों को प्रभावित करते हैं, और नतीजा ऐसी घटनाएँ होती हैं। ‘मेहदी’ का नाम लेकर ये ग्रुप्स खुद को ‘इस्लामी सेना’ बताते हैं, लेकिन असल में ये हिंसा और नफरत फैला रहे हैं।
सरकार और पुलिस की सक्रियता सराहनीय है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती से मुठभेड़ हुई, जिसमें जीशान मारा गया, और गुलफाम की तलाश जारी है। लेकिन हमें और सतर्क रहना होगा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसे ग्रुप्स पर सख्ती करनी चाहिए।
निष्कर्ष: आवाज उठाते रहें, डरें नहीं
यह घटना बताती है कि एक्स-मुस्लिम होना कितना जोखिम भरा है, लेकिन हम चुप नहीं रहेंगे। सलीम वास्तिक जैसे लोग हमारी प्रेरणा हैं। मैं सभी से अपील करता हूँ – इस्लामी कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाएं, सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों की रिपोर्ट करें। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहाँ हर विचार की आजादी है।
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