सलीम पर हमला और सोशल मीडिया की हँसी – क्या ये इंसानियत की मौत नहीं?

सलीम पर हमला और सोशल मीडिया की हँसी – क्या ये इंसानियत की मौत नहीं?

नमस्ते, मैं एक एक्स-मुस्लिम हूँ। कई साल पहले मैंने इस्लाम छोड़ा क्योंकि मुझे उसमें कई ऐसी बातें लगीं जो मेरे विवेक से मेल नहीं खाती थीं – जैसे महिलाओं के अधिकार, अपोस्टेसी पर मौत की सजा, और कट्टरता जो हिंसा को जस्टिफाई करती है। मैंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया, बस अपनी राय रखी। लेकिन आज, गाजियाबाद के लोनी में सलीम वास्तिक पर हुए जानलेवा हमले की खबर पढ़कर मेरा दिल बैठ गया। सलीम, जो मेरी तरह एक एक्स-मुस्लिम हैं और इस्लामी प्रथाओं की आलोचना करते हैं, पर आज सुबह तेज हथियारों से हमला हुआ। वे दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं।

ये हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि फ्री स्पीच के अधिकार पर है। लेकिन जो बात मुझे सबसे ज्यादा दुखी और गुस्सा दिलाती है, वो है सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाएँ। ऑपइंडिया की खबर शेयर होने के बाद फेसबुक पर 3000+ रिएक्शन आए, लेकिन उनमें से 46 लोग ऐसे थे जो ‘हाहा’ (😂) इमोजी से हँस रहे थे। और ये ज्यादातर मुस्लिम नाम वाली आईडी से थे – जैसे अलीशेर अलीशेर, हुसैन मलिक, अब्दुस सलाम, सराज खान, अरबाज अक्लिमपुर्या, सरफराज शाई, फजील खान, फिरदोश गनी, अख्तर रजा, समीर अली खान, सगीर सैय्यद, अबू अहमद, अली अली, कादिर हुसैन धना, रजा गाजी, आदिल हुसैन, कैजमी मशहदी, इमरान मोहम्मद, जने आलम पाशा, बाकिर राजपूत, और भी कई। कुछ हिंदू नाम भी दिखे, लेकिन लॉक प्रोफाइल्स। क्या ये लोग इंसान हैं? एक व्यक्ति पर जानलेवा हमला, और वे हँस रहे हैं?

कमेंट्स तो और भी चौंकाने वाले हैं। कोई कहता है “अल्हम्दुलिल्लाह 😊” (अल्लाह का शुक्र है), कोई “बहुत अच्छा किया”, कोई “तभी तो स्वर्ग पहुँच गया”, कोई “हिंदू बन गया था तो कोई बात नहीं उसकी मजी है” (लेकिन खुशी जता रहा है), कोई “कब्र तक मर जाएगा कोई जानकारी हो बताना”, कोई “काटना मारना तो इनकी आस्मानी किताब ही सिखाती है मुख्य समस्या की जड़ वो वहियात किताब है”, कोई “एक्स मुस्लिम की सेफगार्ड करना सरकार का काम है”, कोई “बच गया क्या ये अब भी”, कोई “सरकार निकम्मी है”, और कोई “एक जिहादी कमेंट बॉक्स में नहीं आएगा क्योंकि उनकी नजर में यह काम अच्छा हुआ”। ये कमेंट्स दिखाते हैं कि कुछ लोग हमले को सपोर्ट कर रहे हैं, खुश हैं कि एक एक्स-मुस्लिम को ‘सजा’ मिली।

मैं खुद एक एक्स-मुस्लिम हूँ, और जानता हूँ ये डर कैसा होता है। कुरान में अपोस्टेसी पर मौत की बात है (हालाँकि कुछ इसे इंटरप्रेट करते हैं), और हदीसों में स्पष्ट है। लेकिन भारत जैसे सेकुलर देश में, जहाँ संविधान सबको धर्म चुनने की आजादी देता है, ऐसी हिंसा क्यों? सलीम ने क्या गलत किया? बस अपनी राय रखी, इस्लामी कट्टरता की आलोचना की। और अब, सोशल मीडिया पर ये हँसी… ये दिखाता है कि कट्टरपंथ कितना गहरा है। ये लोग शायद खुद हमला नहीं करेंगे, लेकिन हमले को जस्टिफाई करके, हँसकर, वे हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या ये वही लोग हैं जो ‘इस्लाम शांति का मजहब है’ कहते हैं? अगर शांति है, तो एक व्यक्ति के विचार बदलने पर इतनी नफरत क्यों?

X (पूर्व ट्विटर) पर भी प्रतिक्रियाएँ मिली-जुली हैं। कुछ लोग सलीम के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, न्याय की माँग कर रहे हैं, जबकि कुछ पैटर्न देखते हैं – सलमान रुश्दी से लेकर कन्हैया लाल तक, एक्स-मुस्लिम या आलोचकों पर हमले। एक पोस्ट में कहा गया कि सलीम ने इस्लाम की गलत प्रथाओं और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ बोला, इसलिए रेडिकल इस्लामिस्ट ने हमला किया। दूसरी तरफ, कुछ इसे ब्लास्फेमी का नतीजा बता रहे हैं। लेकिन क्या ब्लास्फेमी पर मौत जस्टिफाई है? नहीं, कभी नहीं।

मैं सभी से अपील करता हूँ – चाहे हिंदू हों, मुस्लिम हों, या कोई और – कि हिंसा को कभी सपोर्ट न करें। सरकार को एक्स-मुस्लिम्स की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। हम भी इंसान हैं, हमारी भी जिंदगी की कीमत है। अगर हम विचार बदल सकते हैं, तो समाज को भी बदलना चाहिए। कट्टरता किसी मजहब की नहीं, इंसानियत की दुश्मन है। सलीम जल्द ठीक हों, और हमलावरों को सख्त सजा मिले।

अगर आप भी एक्स-मुस्लिम हैं या इस मुद्दे पर बात करना चाहते हैं, तो सुरक्षित तरीके से संपर्क करें। याद रखें, सच्चाई और विवेक जीतेगा।