जब मैं मुसलमान था, तो मुझे बचपन से सिखाया गया था कि इस्लाम इंसाफ़ का दीन है। “इन्नल्लाहा या’मुरु बिल-अदलि वल-इहसान” — अल्लाह इंसाफ़ और भलाई का हुक्म देता है (क़ुरआन 16:90)। लेकिन गुजरात के गरियाधर में जो कुछ हुआ, उसने मुझे एक बार फिर याद दिला दिया कि कई मुसलमानों के लिए यह आयत सिर्फ़ तिलावत तक सीमित है — अमल से इसका कोई वास्ता नहीं।
क्या हुआ था गरियाधर में?
भावनगर ज़िले के रूपावती गाँव में एक अजीबो-गरीब वाक़या हुआ। एक मुस्लिम परिवार — मकबूल, मुबारक, रज़ाक और अल्ताफ़ — ने अपने एक मृतक रिश्तेदार को गाँव के हिंदू श्मशान घाट के पास विवादित ज़मीन पर दफ़ना दिया। जबकि गाँव में मुसलमानों का आधिकारिक क़ब्रिस्तान मौजूद था — करीब 700 वर्ग मीटर में फैला, चारदीवारी से घिरा, और उसका आधा हिस्सा पूरी तरह ख़ाली।
मुस्लिम परिवार ने गुजरात हाईकोर्ट में दलील दी कि “क़ब्रिस्तान फूलों से भरा हुआ है।” जाँच हुई तो यह दावा सरासर झूठ निकला। कोर्ट ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी। 10 दिन तक परिवार ने शव नहीं हटाया। आख़िरकार 27 जुलाई 2026 को प्रशासन को ख़ुद कार्रवाई करनी पड़ी।
यह महज़ एक घटना नहीं, एक पैटर्न है
जाँच में यह भी सामने आया कि यह पहली बार नहीं था। 2021-22 में भी इसी परिवार ने ठीक यही हरकत की थी — एक मृतक को इसी विवादित ज़मीन पर दफ़नाया था। उस वक़्त पुलिस की मौजूदगी में पंचायत हुई, लिखित गारंटी दी गई कि अब कभी ऐसा नहीं होगा। और फिर 2026 में वही हरकत।
यह आकस्मिक नहीं है। यह एक सुनियोजित ज़मीन क़ब्ज़े की रणनीति है — पहले एक मुर्दा दफ़नाओ, फिर उस जगह को क़ब्रिस्तान बताकर क़ानूनी दावा ठोक दो। यह लैंड जिहाद का एक अलग चेहरा है, जिसे ग़स्ब (ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ा) के नाम से जाना जाता है। आज देश में जितने भी मजार खुले हुए है वो सब इसी लैंड जिहाद का हिस्सा है। इसीलिए वक्फ बोर्ड को सरकार कंट्रोल कर रही है क्योंकि वक्फ के नाम पर भी यही हो रहा था।
क़ुरआन इस बारे में क्या कहता है?
मैंने मदरसे में जो पढ़ा, उसी की रोशनी में कुछ बातें करता हूँ:
1. दूसरों का माल हड़पना हराम है
“और तुम आपस में एक-दूसरे का माल नाहक़ न खाओ और न हाकिमों तक इस ग़रज़ से पहुँचाओ कि लोगों के माल का कुछ हिस्सा जान-बूझकर ग़लत तरीक़े से हड़प जाओ।” — क़ुरआन 2:188 (सूरह अल-बक़रह)
इस आयत का सीधा-सादा मतलब है — किसी की ज़मीन, जायदाद, या हक़ पर ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ा करना हराम है। और इसमें कोई शक नहीं कि हिंदू श्मशान घाट के बगल वाली ज़मीन पर मुर्दा दफ़नाकर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करना इसी आयत का खुला उल्लंघन है।
2. अमानत में ख़यानत
“बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हक़दारों तक पहुँचाओ।” — क़ुरआन 4:58 (सूरह अन-निसा)
2021 में इस परिवार ने पूरे गाँव के सामने लिखित गारंटी दी थी कि अब कभी श्मशान के पास दफ़न नहीं करेंगे। फिर 2026 में वही काम किया। क़ुरआन की नज़र में यह अमानत में ख़यानत है। एक मुसलमान का वादा उसकी ज़बान की गवाही है — और इसे तोड़ना मुनाफ़िक़ (पाखंडी) की निशानी है।
3. झूठ बोलना
कोर्ट में कहा गया कि “क़ब्रिस्तान भरा हुआ है” — जबकि 700 वर्ग मीटर का क़ब्रिस्तान आधा ख़ाली था। हदीस में आता है:
“मुनाफ़िक़ की तीन निशानियाँ हैं — जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो तोड़े, और जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़यानत करे।” — सहीह बुख़ारी, हदीस 33
इस हदीस की कसौटी पर मकबूल-मुबारक और उनके परिवार ने तीनों निशानियाँ पूरी कर दीं।
4. पड़ोसी का हक़
इस्लाम पड़ोसी के हक़ पर बहुत ज़ोर देता है। हदीस है कि जिब्रील अलैहिस्सलाम पड़ोसी के हक़ के बारे में इतनी ताकीद करते रहे कि हुज़ूर ﷺ को लगा कि शायद पड़ोसी को वारिस ही बना दिया जाएगा (सहीह बुख़ारी, हदीस 6014)। जब हिंदू पड़ोसियों का श्मशान घाट है, तो वहाँ के पास जानबूझकर क़ब्र बनाकर उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना — यह कौन-सा इस्लाम है?
मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ?
मैंने इस्लाम छोड़ दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं क़ुरआन और हदीस को नहीं जानता। बल्कि इस्लाम को गहराई से समझने के बाद ही मैंने उसे छोड़ा। और मैं यह इसलिए लिख रहा हूँ ताकि मुसलमान ख़ुद अपनी किताब के आईने में अपने आपको देखें।
अगर आप एक मुसलमान हैं और यह पढ़ रहे हैं, तो ख़ुद से पूछिए:
- क्या आपके इलाक़े के मौलवी ने कभी जुमे के ख़ुत्बे में ज़मीन हड़पने पर बात की?
- क्या किसी ने मकबूल-मुबारक को बताया कि क़ुरआन 2:188 के मुताबिक़ वे जो कर रहे हैं वह हराम है?
- क्या आपकी मस्जिद ने इस घटना की निंदा की?
अगर तीनों का जवाब “नहीं” है — और मुझे पूरा यक़ीन है कि होगा — तो समझ जाइए कि समस्या कुछ लोगों की नहीं, बल्कि पूरी कौम की ख़ामोशी की है।
आख़िरी बात
गुजरात हाईकोर्ट ने सही फ़ैसला सुनाया। लेकिन दुख इस बात का है कि एक आम हिंदुस्तानी अदालत को यह बताने की ज़रूरत पड़ी कि “जब आधिकारिक क़ब्रिस्तान मौजूद है, तो मनमाने ढंग से सार्वजनिक ज़मीन पर कब्र नहीं बनाई जा सकती।” यह आम अक़्ल की बात है — इसे बताने के लिए हाईकोर्ट की क्यों ज़रूरत पड़ी?
क़ुरआन में लिखा है: “ऐ ईमान वालों, इंसाफ़ पर मज़बूती से क़ायम रहो।” (क़ुरआन 4:135)। अफ़सोस कि बहुत से लोगों के लिए इंसाफ़ सिर्फ़ तब तक है जब तक वह उनके अपने फ़ायदे में हो।
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यह मेरे एक निजी विचार हैं और इस्लामी स्रोतों के संदर्भ में लिखे गए हैं। स्रोत: OpIndia हिंदी, Times of India, LiveLaw — 28 जुलाई 2026 की रिपोर्ट।





