दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा हत्याकांड के आरोपी ताहिर हुसैन दोषी करार: जिहादी मानसिकता का जिंदा उदाहरण 

दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा हत्याकांड के आरोपी ताहिर हुसैन दोषी करार: जिहादी मानसिकता का जिंदा उदाहरण 

आज जब मैं दिल्ली के चाँद बाग इलाके में 2020 के दंगों के दौरान निर्दोष हिंदू युवक अंकित शर्मा की निर्मम हत्या और आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के दोषी करार होने की खबर पढ़ता हूँ, तो मेरे अंदर गुस्सा, दर्द और एक गहरी समझ पैदा होती है। मीडिया की ग्राउंड रिपोर्ट इस पूरे मामले को बेनकाब करती है।

क्या हुआ था उस दिन?

2020 के दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा ड्यूटी से घर लौटे। बैग रखा, चाय तक नहीं पी और मुस्लिम भीड़ ने उन्हें पकड़ लिया। ताहिर हुसैन की छत से पेट्रोल बम फेंके गए, गाड़ियाँ जलाई गईं, ईंट-पत्थर बरसाए गए। अंकित को ताहिर के घर के पास खींचकर चाकूओं से गोद गोद कर मार डाला गया और उनका शव नाले में फेंक दिया गया। छह साल बाद कोर्ट ने ताहिर हुसैन समेत पाँच लोगों को दोषी ठहराया। लेकिन क्या सचमुच इतना समय लगना चाहिए था? और क्या सिर्फ कुछ लोगों को सजा देने से समस्या खत्म हो जाती है?

चाँद बाग की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि हिंदू आज भी डर के साए में जी रहे हैं। लोग मकान बेचकर भाग रहे हैं। नामप्लेटें तो हिंदू नामों वाली हैं — सीता निवास, श्रीराम निवास — लेकिन अंदर अब अब्दुल और सलीम रहते हैं। इलाका धीरे-धीरे मुस्लिम बस्ती बन रहा है। हिंदू पड़ोसी कह रहे हैं कि अब मुसलमानों पर भरोसा नहीं रहा। दोस्ती तो दूर, बात करने से भी डर लगता है।

पूर्व मुस्लिम की नजर से सच्चाई

जो लोग कहते हैं कि “यह राजनीति है”, “सिर्फ कुछ बदमाश थे”, वे झूठ बोल रहे हैं या खुद को धोखा दे रहे हैं। इस्लाम की शिक्षाओं में काफिरों (गैर-मुस्लिमों) के प्रति घृणा और हिंसा की जड़ें गहरी हैं। कुरान और हदीस में बार-बार जिहाद, कत्ल और इस्लामी प्रभुत्व की बात की गई है। ताहिर हुसैन जैसे लोग अकेले नहीं होते — वे उस आइडियोलॉजी का उत्पाद हैं जो मस्जिदों में, मदरसों में और घरों में पली-बढ़ी है।

मैंने खुद देखा है कि कैसे “मुस्लिम पीड़ित” का नैरेटिव बनाया जाता है, जबकि हिंदू परिवारों पर अत्याचार को नजरअंदाज कर दिया जाता है। अंकित शर्मा कोई अपराधी नहीं था। वह एक हिंदू परिवार का IB ऑफिसर था, जो अपने परिवार के लिए जी रहा था। लेकिन जिहादी भीड़ के लिए वह सिर्फ एक “काफिर” था।

राजवती जैसी महिलाएँ सही कहती हैं — “ये लोग कसाई हैं”। जिस घर में बकरा काटना रोज का रिवाज हो, तो इंसानियत कहाँ से आएगी? हिंदू तो गलती से जीव हत्या पर एकादशी रखते हैं, लेकिन ये लोग दोस्त को भी मार देने में नहीं हिचकिचाते।

पलायन और जनसांख्यिकीय बदलाव

चाँद बाग सिर्फ एक उदाहरण है। भारत के कई इलाकों में यही पैटर्न दोहराया जा रहा है — पहले हिंसा, फिर डर, फिर पलायन और फिर मुस्लिम बहुल इलाका। हिंदू चुपचाप अपना घर बेचकर सुरक्षित जगह जा रहे हैं। भाजपा सरकार आने के बाद सुरक्षा बढ़ी, लेकिन जड़ें अभी भी गहरी हैं।

जब तक मुस्लिम समाज इस्लाम की जड़ों — शरिया, जिहाद, काफिर-घृणा — पर सवाल नहीं उठाएगा, तब तक ऐसे ताहिर हुसैन पैदा होते रहेंगे। मॉडरेट मुसलमान चुप रहते हैं क्योंकि  उनके कुछ भी बोलने से इस्लामी नारेटिव टूटेगा और लोग उसे इस्लाम विरोधी समझ सकते हैं। और मज़हब में इस्लाम विरोधी या “अपोस्टेट” (जो इस्लाम छोड़ दे) को मौत की सजा का प्रावधान है। मैंने छोड़ दिया, इसलिए बोल रहा हूँ।

निष्कर्ष: समय जागने का है

अंकित शर्मा की हत्या कोई इकलौता मामला नहीं है। यह इस्लामी कट्टरता का परिणाम है। एक्स मुस्लिम के तौर पर मैं कहता हूँ — इस्लाम का सुधार नहीं किया जा सकता, उसे समझकर और छोड़ना ही समाधान है। हिंदू समाज को सतर्क रहना होगा। सिर्फ पलायन से समस्या हल नहीं होगी, जागरूकता, मजबूत कानून-व्यवस्था और हिंदूवादी सरकार से ही बदलाव हो सकता है।

ताहिर हुसैन को फाँसी मिलनी चाहिए। लेकिन असली लड़ाई विचारधारा की है। ज्यादा से ज्यादा हिंदू समाज इस्लाम को।समझे और एकजुट हों।

जय हिंद।

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