न्यायालय के द्वारा दोषी करार देने के बाद भी दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा की हत्या करने वाले ताहिर हुसैन का उनके मुस्लिम रिश्तेदार और पड़ोसी बता रहे अभी भी निर्दोष।

न्यायालय के द्वारा दोषी करार देने के बाद भी दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा की हत्या करने वाले ताहिर हुसैन का उनके मुस्लिम रिश्तेदार और पड़ोसी बता रहे अभी भी निर्दोष।

इस्लाम छोड़ने के बाद जब मैंने कुरान, हदीस, सिरत और इतिहास को निष्पक्ष नजरिए से पढ़ा, तो एक बात साफ हो गई — इस विचारधारा में काफिरों (गैर-मुस्लिमों) के प्रति नफरत और हिंसा को मज़हबी कर्तव्य का दर्जा दिया गया है। आज जब 2020 के दिल्ली हिंदू-विरोधी दंगों में IB अधिकारी अंकित शर्मा की निर्मम हत्या के मामले में ताहिर हुसैन को कोर्ट ने दोषी ठहराया है, तो मेरे सामने वही पुरानी इस्लामी मानसिकता फिर उभर कर आई है — अपराध करने के बाद भी इनकार, पीड़ित बनने का ढोंग और “अल्लाह जानता है” वाला तावीज़।

 

चांद बाग की घटना: इस्लामी जिहादी पैटर्न

25 फरवरी 2020 को CAA-NRC के विरोध की आड़ में भड़के दंगों में अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन के घर की छत से चल रही भीड़ ने निशाना बनाया। उन्हें घर में घसीटा गया, चाकुओं से 51 वार किए गए और शव नाले में फेंक दिया गया। यह कोई आकस्मिक हिंसा नहीं थी। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि घर की छत पर पेट्रोल बम, गुलेल और पत्थरों का जखीरा था — ठीक वैसा ही जैसा इस्लामी इतिहास में काफिरों पर हमलों के लिए इस्तेमाल होता रहा है।

लेकिन सबसे खतरनाक बात कोर्ट के फैसले के बाद भी इलाके के मुसलमानों का रवैया है। “ताहिर बेगुनाह है”, “फंसाया गया”, “भीड़ ने किया” — यह तकिया का क्लासिक उदाहरण है। इस्लाम में जब मुसलमानों पर दबाव हो तो झूठ बोलना जायज माना जाता है। उम्मा (मुस्लिम समुदाय) की एकजुटता काफिर न्याय से ऊपर होती है। यही वजह है कि हाफिज, चौकीदार, भतीजे और पड़ोसी सब एक सुर में गा रहे हैं।

 

इस्लामी विचारधारा की आलोचना

कुरान की कई आयतें (जैसे सूरा 9:5, 9:29, सूरा 8:39) गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लड़ाई को फर्ज बताती हैं। हदीसों में मुहम्मद साहब के युद्धों को आदर्श माना जाता है। जब तक मुस्लिम समाज इन शिक्षाओं को खुले तौर पर नकार नहीं देता, तब तक “शांति” सिर्फ दिखावा रहेगा।

दिल्ली दंगे इसका जीता-जागता प्रमाण हैं। CAA-NRC को “इस्लाम पर हमला” बता कर भड़काया गया, ठीक वैसे जैसे ऐतिहासिक रूप से जिहाद को “रक्षा” का नाम दिया जाता रहा है। नतीजा? 53 से ज्यादा मौतें। लेकिन समुदाय आज भी “हम पीड़ित हैं” का नैरेटिव थामे हुए है। ताहिर हुसैन जैसे लोग इस विचारधारा से प्रेरित होकर हिंसा फैलाते हैं, और पूरा मोहल्ला उन्हें “अल्लाह का बंदा” बताकर बचाता है।

मैंने खुद इस जाल से निकलने के बाद महसूस किया — इस्लाम व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि एक पूर्ण राजनीतिक-धार्मिक सिस्टम है जो  (Muslim superiority) सिखाता है। गैर-मुस्लिमों को Dhimmi (दबाए रखने लायक) स्टेटस या मौत/मतांतरण का विकल्प। यही सोच चांद बाग में अंकित शर्मा की हत्या के पीछे काम कर रही थी।

एक्स मुस्लिम का साफ संदेश

इनकार की संस्कृति छोड़ो: मुस्लिम समाज से गुज़ारिश है कि अपराधी को बचाना बंद करो। सच्चाई स्वीकार करो कि समस्या इस्लामी शिक्षाओं की जड़ में है।

आलोचना जरूरी: कुरान-हदीस की हिंसक आयतों पर खुली बहस होनी चाहिए। बिना सुधार के शांति असंभव है।

भारत के लिए चेतावनी: हिंदू बहुल देश में इस्लामी अलगाववाद और जिहादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाली कोई भी राजनीति या मस्जिद-मदरसा संस्कृति खतरनाक है।

अंकित शर्मा की शहादत हमें याद दिलाती है कि इस्लामी कट्टरता से लड़ना हर न्यायवादी और मानवतावादी नागरिक का कर्तव्य है। न्याय हुआ है, लेकिन जड़ें अभी भी बाकी हैं।

— एक एक्स मुस्लिम की कलम से

 

(यह ब्लॉग ओपइंडिया रिपोर्ट, कोर्ट फैसले और इस्लामी ग्रंथों के आधार पर लिखा गया है। उद्देश्य सच्चाई और सुधार है।)

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