नमाज के बहाने मंदिरों पर कब्जे की साजिश: एक पुरानी इस्लामी नीति।

नमाज के बहाने मंदिरों पर कब्जे की साजिश: एक पुरानी इस्लामी नीति।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जो हुआ, वो कोई इंसिडेंट नहीं, बल्कि एक पुरानी साजिश का नया अध्याय है। एक मुस्लिम राजमिस्त्री असर मोहम्मद ने बारिश का बहाना बनाकर प्राचीन हनुमान मंदिर के अंदर घुसकर नमाज पढ़ ली। उसका साथी सुरक्षा की मुद्रा में खड़ा रहा। वीडियो वायरल होने पर पुलिस ने एक्शन लिया, FIR दर्ज हुई और आरोपी जेल गया। लेकिन लिबरल गैंग ने तुरंत बचाव शुरू कर दिया—”ईश्वर तो एक है”, “गंगा-जमुनी तहजीब”।

भाइयों, ये कोई भूल-चूक नहीं है। ये सिस्टेमैटिक पैटर्न है। पहले मंदिर परिसर में नमाज, फिर “ये जगह हमारी थी” का दावा, फिर कोर्ट-कचहरी और आखिर में हिंदुओं को अपनी ही जगह के लिए लड़ना पड़ता है। भोजशाला, ज्ञानवापी, मलिहाबाद का कंस किला—सबके सब इसी स्क्रिप्ट पर चल रहे हैं।

एक एक्स मुस्लिम की नजर से

जब मैं मुस्लिम घराने में बड़ा हो रहा था, तो मुझे सिखाया गया कि गैर-मुस्लिमों की पूजा-पाठ बुतपरस्ती है। काफिरों के मंदिरों पर विजय हासिल करना जिहाद का हिस्सा माना जाता था। इतिहास गवाह है—सीताराम गोयल की किताब “हिंदू टेम्पल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम” में 1800 से ज्यादा मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाए जाने का जिक्र है। दिल्ली की कुतुब मीनार, वाराणसी की ज्ञानवापी, अयोध्या—सबूत आज भी मौजूद हैं। मोहम्मद बिन कासिम से लेकर औरंगजेब तक सबने यही तो किया है। पहले तलवार के जोर से ये सब मुमकिन था लेकिन आज सरकार हिन्दुनीतियों वाली है तो अब ये करना इनलोगों के लिए थोड़ा कठिन हो गया है।

लेकिन आज भी वही मानसिकता काम कर रही है। मजदूर, मजबूरी, बारिश—ये सब बहाने हैं। असली मकसद इस्लामी हुक़ूमत और कब्जा है। हिंदू समाज की सहिष्णुता का फायदा उठाया जा रहा है। अगर कोई हिंदू चर्च में नमाज पढ़ने चला जाए तो क्या होगा? या मक्का में मूर्ति पूजा? सोचिए।

लिबरल दोस्तों, आपकी “सर्वधर्म समभाव” की भावना मानवीय हो सकती है, लेकिन ये आत्मघाती है। जब हिंदू विरोध करते हैं तो उन्हें “नफरत फैलाने वाला” कहा जाता है, लेकिन जो मंदिर की मर्यादा भंग कर रहा है, उसे “मजबूर नमाजी”। ये दोहरा मापदंड कब तक चलेगा?

हिंदू समाज को सचेत होने की जरूरत

मैं एक एक्स मुस्लिम होने के नाते कहता हूँ—इस्लाम में सहिष्णुता का कोई गुंजाइश नहीं है जहां तक कि वो राजनीतिक इस्लाम की बात न हो। कुरान और हदीस में गैर-मुस्लिमों के प्रति जो नजरिया है, वो शांति नहीं, वर्चस्व की बात करता है। भारत में रहने वाले कुछ मुसलमान अच्छे हो सकते हैं, लेकिन कट्टर मुसलमानों का एक पूरा वर्ग तैयार हो चुका है जो अन्य मुसलमानों को भी कट्टर बनाने के कार्य में दिन रात लगा हुआ है।

बुलंदशहर की घटना हमें याद दिलाती है कि:
– मंदिरों की सुरक्षा मजबूत हो।
– ऐसे अतिक्रमण पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
– लिबरल मीडिया और बुद्धिजीवियों का दोहरा चरित्र उजागर हो।
– हिंदू समाज जागे और अपनी आस्था की रक्षा करे।

मैंने इस्लाम छोड़ा क्योंकि मैंने सच्चाई देख ली। हिंदुस्तान मेरी मातृभूमि है। यहां पर सभी देवी-देवताओं की पूजा का अधिकार हर हिंदू का जन्मसिद्ध अधिकार है। किसी को भी मंदिर में नमाज पढ़कर “इबादत” का ढोंग नहीं रचने दिया जाना चाहिए।

भारत माता की जय।

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