तोहा खालसा का जौहर: जब 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने कुएँ में कूदकर ‘मुस्लिम हुए बिना’ मरना चुना एक

तोहा खालसा का जौहर: जब 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने कुएँ में कूदकर ‘मुस्लिम हुए बिना’ मरना चुना एक

भूमिका: एक खूनी सवेरा जिसे हम भूल गए

1947 का बँटवारा भारतीय इतिहास का वह ज़ख्म है जो आज भी हर साल अगस्त में कराहता है। लेकिन हमारी “सेक्युलर” किताबों और “वामपंथी” इतिहासकारों ने एक चीज़ हमेशा छुपाई—या कम-से-कम धुँधली कर दी—कि उस खून-खराबे में सबसे ज़्यादा कौन मारा गया, और किसने किसको मारा।

रावलपिंडी का तोहा खालसा वह गाँव है जहाँ 1947 में 93 हिंदू-सिख महिलाओं ने सामूहिक रूप से कुएँ में छलाँग लगाकर अपनी जान दी—ताकि मुस्लिम लुटेरों के हाथ न लगें। इसे कहते हैं ‘जौहर’—राजपूत परंपरा का वह संस्कार जिसमें महिलाएँ अपनी अस्मत बचाने के लिए आग में कूदती थीं या कुएँ में। तोहा खालसा में वही हुआ, बस यह 1947 था, और दुश्मन मुगल या तुर्क नहीं, बल्कि आधुनिक “मुस्लिम लीग” और उसके लश्कर थे।

एक भारतीय मुस्लिम के तौर पर मैं यहाँ सीधा-सीधा पूछना चाहता हूँ: क्या हम मुसलमान अपने उस चेहरे को देखने को तैयार हैं जो 1947 में हिंदुओं और सिखों ने देखा था?

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तोहा खालसा: क्या हुआ था ठीक-ठीक

तोहा खालसा अब पाकिस्तान के पंजाब में, रावलपिंडी ज़िले में पड़ता है। 1947 में यह एक सिख-बहुल गाँव था, जिसके आसपास कुछ हिंदू परिवार भी रहते थे। मार्च 1947 में जब पंजाब में सांप्रदायिक दंगे भड़के, तो रावलपिंडी और आसपास के इलाक़े—जो “पाकिस्तान” में जाने वाले थे—में हिंदुओं और सिखों पर व्यवस्थित हमले शुरू हुए।

तोहा खालसा के ग्रामीणों ने शुरुआत में डटकर मुक़ाबला किया। लेकिन जब लश्कर बढ़ता गया, गोला-बारूद ख़त्म हुआ, और चारों तरफ़ से घेरा तंग होने लगा—तो गाँव के बुज़ुर्गों ने वह फ़ैसला लिया जो सदियों से राजपूत करते आए थे।

पहले बच्चों और बूढ़ों को कुएँ में उतारा गया। फिर महिलाओं ने एक-एक करके छलाँग लगाई। रिपोर्टों के मुताबिक़ लगभग 90 से 93 महिलाओं ने जौहर किया। कुछ वृत्तांतों में कहा जाता है कि जब कुएँ में कूदने की जगह नहीं बची, तो बची हुई महिलाएँ रोने लगीं—इस डर से कि कहीं ज़िंदा पकड़ी गईं तो क्या होगा।

बाद में जो बचे-खुचे सिख-हिंदू लड़े, वे शहीद हुए। और जो महिलाएँ बचीं, उनमें से कई को बाद में “वापस लाया गया”—लेकिन यह एक और कहानी है, जिसे आगे छूऊँगा।

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‘जौहर’ क्या है, और यह हिंदू-सिख महिलाओं के लिए क्यों ज़रूरी हो गया?

यह समझने के लिए हमें सीधे-सीधे इस्लामी इतिहास के उस पहलू पर आना होगा जिसे मुस्लिम इतिहासकार आमतौर पर “गौरव” के साथ पढ़ाते हैं, लेकिन उसके दूसरे पहलू को कम बोलते हैं।

जौहर की परंपरा भारत में मुस्लिम आक्रमणों के बाद ही व्यवस्थित रूप लेती है। कारण सीधा है: जब विजेता सेना शहर पर क़ब्ज़ा करती थी, तो पराजित पुरुष मारे जाते थे—लेकिन महिलाओं को अक्सर गुलामी, हरम या लूट के माल के तौर पर ले जाया जाता था। जहां ये मुस्लिम भेड़ियां दिन रात उन महिलाओं का बलात्कार करते है फिर उनको दूसरे मर्दों को बेच देते।

– महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों में मंदिरों के साथ-साथ हज़ारों महिलाएँ भी लूटी गईं।
– मुहम्मद ग़ोरी के बाद दिल्ली सल्तनत के दौर में हरम और गुलामी का सिलसिला संस्थागत हो गया।
– तैमूर (1398) के हमले में दिल्ली में क़त्ल-ए-आम हुआ, और हज़ारों महिलाएँ गुलाम बनाकर ले जाई गईं।

इसी ऐतिहासिक अनुभव से जौहर पैदा हुआ। यह हिंदू महिला का “आत्म-समर्पण” नहीं, बल्कि एक सचेत फ़ैसला था—कि “अगर जीत का मतलब गुलामी है, तो मौत बेहतर है।”

1947 में तोहा खालसा की महिलाओं ने ठीक यही किया। और यहाँ एक बात ध्यान देने की है: यह सिख महिलाएँ थीं, जिनका जौहर से सीधा ऐतिहासिक नाता नहीं था। लेकिन 1947 के हालात ने उन्हें भी वही रास्ता चुनने पर मजबूर कर दिया जो उनकी हिंदू बहनों ने सदियों से चुना था। यही भारत की साझा सभ्यतागत स्मृति है।

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