जब मैं ब्रिटिश सांसद रुपर्ट लोव द्वारा संसद में पढ़ी गई उन गवाहियों को पढ़ता हूँ, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रिपोर्ट में जो वर्णन है – ब्रिटेन की नाबालिग लड़कियों के साथ मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग के मर्दों के द्वारा प्राइवेट पार्ट में शीशे की बोतल घुसाकर फोड़ना, चेहरे पर सिगरेट जलाना, ईसाई क्रॉस देखकर ताने मारना, “तेरा ईश्वर कहाँ है?” कहना – ये सब कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि ब्रिटेन की सैकड़ों गोरी लड़कियों के साथ हुए संगठित यौन शोषण की हकीकत है।
क्या हुआ ब्रिटेन में?
रुपर्ट लोव ने संसद में पीड़िताओं की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। एक लड़की ने बताया कि उसके साथ 600-700 अलग-अलग पुरुषों ने रेप किया। एक बच्ची का चेहरा सिगरेट से दाग दिया गया। 12-13 साल की उम्र में शराब की बोतल प्राइवेट पार्ट में डालकर फोड़ दी गई। कई लड़कियों को कुत्तों के पिंजरे में बंद करके रखा गया। ये अत्याचार ईद जैसे त्योहारों पर और बढ़ जाते थे, क्योंकि “पार्टियाँ” होती थीं। सबसे घिनौना पहलू – ये सब ज्यादातर पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम पुरुषों द्वारा ब्रिटिश मूल की गोरी, ईसाई लड़कियों पर किया गया। वे कहते थे कि “गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं”।
ये Rotherham, Rochdale, Telford जैसे कई शहरों में दशकों से चल रहा था। पुलिस और प्रशासन चुप रहे, क्योंकि “इस्लामोफोबिया” का डर था। राजनीतिक सुधारवाद ने हजारों निर्दोष लड़कियों की जिंदगी बर्बाद कर दी।
एक्स मुस्लिम के रूप में मेरा नजरिया
मैंने इस्लाम में रहते हुए देखा था कि काफिरों (गैर-मुस्लिमों) के प्रति एक तरह की श्रेष्ठता का भाव कितना गहरा है। कुरान और हदीसों में जिहाद, गैर-मुस्लिम महिलाओं को “माल-ए-गनीमत” मानने की मानसिकता, और “काफिर औरतों” के साथ किए जाने वाले जो व्यवहार की इजाजत दी गई है, वो इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा देती है।
मुस्लिम समुदायों में अक्सर ये सोच पाई जाती है कि पश्चिमी, गोरी, या गैर-मुस्लिम लड़कियाँ “आसान शिकार” हैं क्योंकि वे “आजाद ख्याल” हैं। ये कोई व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक-और मज़हबी पैटर्न है जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान, और कई मुस्लिम देशों में भी दिखता है। ब्रिटेन में ये “ग्रूमिंग गैंग” जिहादी मानसिकता का ही विस्तार थे – संख्या में बढ़कर, कमजोरों को निशाना बनाकर, और फिर मज़हब के नाम पर न्यायसंगत ठहराना।
मैं खुद इस्लाम छोड़कर आजाद हुआ हूँ। जब मैं कुरान पढ़ता था तो “काफिरों” के प्रति घृणा और महिलाओं के दर्जे को लेकर जो आयतें थीं, वे आज भी मुझे परेशान करती हैं। लाखों एक्स मुस्लिम चुपचाप इस सच को जानते हैं, लेकिन डर के मारे बोल नहीं पाते।
सच्चाई का सामना करने का समय
– इस्लामिक शिक्षाओं की समीक्षा जरूरी है: जब तक पैगंबर मोहम्मद और उमर, अबू बक्र जैसे सहाबाओं के युद्धों और गैर-मुस्लिम औरतों के साथ व्यवहार को आदर्श माना जाएगा, तब तक ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी।
– पीड़िताओं के साथ न्याय: ब्रिटेन को पूर्ण राष्ट्रीय जांच करनी चाहिए, मुस्लिम शरणार्थियों को आना बंद करना चाहिए, ऐसे मुस्लिम अपराधियों को निर्वासित करना चाहिए, और राजनीतिक correctness को कूड़े में फेंकना चाहिए।
– मुस्लिम युवाओं से अपील: भाइयो, इस हिंसा और श्रेष्ठता की संस्कृति को छोड़ो। इंसानियत सीखो। औरतों को इज्जत दो – चाहे वो किसी भी धर्म की हों।
बतौर एक एक्स मुस्लिम मैं कहना चाहता हूँ कि– इस्लाम में सुधार संभव नहीं, क्योंकि मूल स्रोत ही समस्या है। हजारों लड़कियों की चीखें आज भी गूंज रही हैं। आज पूरी दुनिया को इस्लाम के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है।
जय हिंद





