माली का खूनख़राबा: जब इस्लामी जिहाद फिर से निहत्थों का शिकार कर गया

माली का खूनख़राबा: जब इस्लामी जिहाद फिर से निहत्थों का शिकार कर गया

नमस्कार दोस्तों,

इस्लाम छोड़ने के बाद मैंने कई बार सोचा कि अब शायद ये सब ख़बरें मुझे कम प्रभावित करेंगी। लेकिन आज जब माली के कोरिकोरी और गोमोसोगो गाँवों की ख़बर पढ़ी, तो फिर वही पुराना दर्द, वही गुस्सा और वही शर्म उभर आई। अल-क़ायदा से जुड़े JNIM आतंकियों ने दो गाँवों में घुसकर 50 से ज़्यादा निहत्थे लोगों को मार डाला। महिलाएँ, बच्चे, किशोर—किसी को नहीं बख्शा। घरों में आग लगाई, लूटपाट की और गोलियों की बौछार कर दी।

ये कोई “सशस्त्र संघर्ष” नहीं था। ये निहत्थे गाँव वालों पर एकतरफ़ा क़त्लेआम था।

क्या कहती है ये घटना?

माली में पिछले कई सालों से इस्लामी आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। JNIM, जो अल-क़ायदा की शाखा है, नियमित रूप से “काफ़िरों” और “मुशरिकों” के खिलाफ़ जिहाद का दावा करते हुए हमले करता रहता है। इस बार उन्होंने ग्रामीणों को निशाना बनाया—वे लोग जो शायद खेती-किसानी करते थे, परिवार पाल रहे थे और किसी की जान लेने का ख़्वाब भी नहीं देख रहे थे।

मरने वालों में स्थानीय रक्षक दल के सदस्य तो थे ही, लेकिन ज़्यादातर आम नागरिक, बच्चे और महिलाएँ थीं। आतंकियों ने गाँवों को आग के हवाले कर दिया। ये ठीक वैसा ही अमानवीय कृत्य है जैसा ISIS, बोको हराम, तालिबान और बाकी दर्जनों जिहादी गुट दुनिया भर में करते रहे हैं।

एक्स मुस्लिम होने के नाते मेरी बात

जब मैं मुसलमान था, तब हमें सिखाया जाता था कि जिहाद अल्लाह की राह में लड़ना है और शहीद होने पर जन्नत मिलेगी। काफ़िरों से लड़ना, उनके घर जलाना, उनकी संपत्ति हड़पना—ये सब “इस्लामी इतिहास” के गौरवपूर्ण अध्याय बताए जाते थे। कुरान और हदीस में जिहाद की आयतें और हदीसें पढ़कर हमें यह समझाया जाता था कि ये मज़हब की हिफाजत का काम है।

लेकिन आज जब मैं बाहर से देखता हूँ तो सच्चाई साफ़ दिखती है। ये हमले कोई “राजनीतिक प्रतिक्रिया” या “गरीबी का नतीजा” नहीं हैं। ये इस्लामी विचारधारा का सीधा नतीजा हैं—वो विचारधारा जो दुनिया को दारुल इस्लाम और दारुल हर्ब में बाँटती है, जो गैर-मुस्लिमों को second-class नागरिक (धिम्मी) मानती है या फिर उन्हें मारने का आदेश देती है।

JNIM के आतंकी कुरान की उन आयतों से प्रेरणा ले रहे हैं जिन्हें आज भी लाखों मदरसों में पढ़ाया जा रहा है। जब तक मुस्लिम समाज इन आयतों और हदीसों की आलोचना नहीं करेगा, जब तक “जिहाद” शब्द को उसके हिंसक ऐतिहासिक अर्थ से अलग करके सिर्फ़ “आत्म-संघर्ष” नहीं बताया जाएगा, तब तक ऐसे क़त्लेआम रुकेंगे नहीं।

चुप्पी ख़तरनाक है

मुस्लिम देशों और संगठनों से मैं पूछना चाहता हूँ—आपकी “कड़ी निंदा” कहाँ है? ओआईसी कहाँ है? भारत के कुछ “सेकुलर” Maulanas जो हर छोटी-मोटी बात पर बयान जारी करते हैं, वे इस पर चुप क्यों हैं? क्योंकि पीड़ित अफ़्रीकी गाँव वाले हैं? या इसलिए कि हमलावर “अल्लाहु अकबर” चिल्लाते हुए मार रहे थे?

माली की सेना ने कुछ आतंकियों को मार गिराया है—ये अच्छी बात है। लेकिन जब तक जड़ पर हमला नहीं होगा, यानी इस्लामी जिहादी विचारधारा पर, तब तक ये सिलसिला चलता रहेगा।

अंत में

मैं कहता हूँ—इस्लाम छोड़ना मेरे लिए सबसे सही फैसला था। आज मैं बिना किसी अपराधबोध के इन निर्दोषों के लिए शोक व्यक्त कर सकता हूँ और बिना डरे इस जिहादी मानसिकता की निंदा कर सकता हूँ।

माली के उन परिवारों के प्रति संवेदना जो अपने प्रियजनों को खो बैठे। और उन हजारों अज्ञात नामों के लिए भी जो अफ़्रीका, एशिया और पूरी दुनिया में रोज़ इसी जिहादी हिंसा का शिकार हो रहे हैं।

जिहाद नहीं, इंसानियत ज़िंदाबाद।
अंधविश्वास नहीं, तर्क और करुणा ज़िंदाबाद।