नमस्कार दोस्तों,
जहां मज़हब का नाम लेकर निर्दोषों का खून बहाया जाता है, वहां चुप रहना गुनाह है। आज मैं दैनिक भास्कर और अन्य स्रोतों से आए उस दिल दहला देने वाले समाचार पर लिख रहा हूं, जो आगरा से सामने आया है। 13 वर्षीय अवनी कुशवाहा नाम के एक मासूम बच्चे की हत्या।
अवनी के पिता नरेश कुशवाहा ने अपना खेत एक मुस्लिम परिवार को बटाई (sharecropping) पर दे रखा था। बच्चा अपने ही खेत से तरबूज तोड़ने गया, तो सद्दाम, अरशद और उनके गिरोह ने उसे जंगली जानवरों की तरह घेर लिया। आरोप है कि उन्होंने बच्चे की क्रूरता से हत्या कर दी। एक 13 साल का बच्चा, जो बस फल तोड़कर घर लाना चाहता था, अपनी जमीन पर।
यह कोई साधारण झगड़ा नहीं था। यह मज़हबी नफ़रत और जमीन पर कब्जे की मानसिकता का नतीजा लगता है। जब हिंदू अपनी ही जमीन पर जाता है तो “काफिर” कहकर मार दिया जाए – यह सोच किस किताब से आती है? किस तालीम से आती है? मैं खुद इस्लाम में रह चुका हूं, जानता हूं कि कुछ मौलवियों और कट्टर घरानों में “गैर-मुस्लिम” की जान और माल को हलाल समझा जाता है।
यह अकेला मामला नहीं है
– ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां sharecropping या पड़ोस में रहने वाले हिंदू परिवारों पर हमले हुए हैं।
– बच्चे को इस क्रूर तरीके से मारना – आंखें निकालना – साधारण गुस्सा नहीं दर्शाता। यह नफरत की गहराई दिखाता है।
– पुलिस ने आरोपी गिरफ्तार किए होंगे, लेकिन सवाल यह है कि समाज में यह सोच कहां से पनप रही है? मदरसों में, घरों में सिखाई जाने वाली “काफिर” वाली मानसिकता से ही।
मैं एक्स मुस्लिम होने के नाते कहता हूं – इस्लाम में सुधार की गुंजाइश बहुत कम है जब तक कि कुरान और हदीस की उन आयतों पर खुलकर बहस न हो जो गैर-मुस्लिमों के प्रति हिंसा को बढ़ावा देती हैं। जितने भी “मॉडरेट” मुसलमान हैं, वे चुप रहकर इस हिंसा के अप्रत्यक्ष सहयोगी बन जाते हैं।
अवनी जैसे मासूमों की मौत पर सारा हिंदुस्तान को जागना चाहिए। हिंदू समाज को अपनी जमीन, अपनी बेटियां और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए सतर्क रहना होगा। बटाई या किराए पर जमीन देने से पहले सोचना होगा –
अवनी कुशवाहा की आत्मा को शांति मिले। उसके परिवार को न्याय मिले। और उन लोगों को सख्त सजा मिले जिन्होंने इस नन्हे बच्चे को इस दुनिया से रूठा दिया।
(यह ब्लॉग सच्ची घटना पर आधारित है। स्रोत: समाचार और सोशल मीडिया रिपोर्ट्स।





