सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला – सुबह की नमाज के बाद चुप कराने की कोशिश

सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला – सुबह की नमाज के बाद चुप कराने की कोशिश

नमस्कार दोस्तों,

मैं एक एक्स-मुस्लिम हूं। सालों पहले मैंने इस्लाम को छोड़ा था, क्योंकि मेरे लिए सच्चाई और तर्क से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं। मैंने कुरान, हदीस और इस्लामिक परंपराओं की उन बातों पर सवाल उठाए जो आज के समय में अमानवीय और असंगत लगती हैं – महिलाओं के अधिकार, विज्ञान से टकराव, और आलोचना पर हिंसा का जवाब। आज मैं सलीम वास्तिक की खबर पर लिख रहा हूं, जो मेरी अपनी जिंदगी की तरह ही दर्दनाक और चिंताजनक है।

शुक्रवार को, रमजान के महीने में, सुबह की नमाज के ठीक बाद गाजियाबाद के लोनी इलाके (अशोक विहार कॉलोनी/अली गार्डन) में सलीम पर जानलेवा हमला हुआ। दो बाइक सवार हमलावर उनके घर/ऑफिस में घुसे, चाकुओं से उनके गले, पेट, छाती और गर्दन पर कई वार किए। खून से लथपथ सलीम मौके पर गिर पड़े। हमलावर फरार हो गए। उन्हें तुरंत दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है। पुलिस जांच कर रही है, लेकिन अब तक हमलावरों की कोई पुख्ता पहचान नहीं हुई।

फोटो साभार -the quote

सलीम कौन हैं? एक खुली आवाज जो कट्टरपंथियों को असहज करती है

सलीम वास्तिक (उर्फ सलीम वारसी) खुद को एक्स-मुस्लिम बताते हैं और यूट्यूब पर ‘सलीम वास्तिक 0007’ चैनल चलाते हैं, जिसमें करीब 28 हजार सब्सक्राइबर्स हैं। वे इस्लाम की कुरीतियों, मौलवियों की गलत व्याख्याओं और कट्टरपंथ पर खुलकर बोलते हैं। टीवी शो में हिस्सा ले चुके हैं, सार्वजनिक बहसों में मौलानाओं को चुनौती दी है। वे सुधारवादी रुख रखते हैं – इस्लाम को आधुनिक बनाने, महिलाओं को बराबरी देने, और विज्ञान को जगह देने की बात करते हैं। लेकिन यही बातें कट्टरपंथियों को चुभती हैं।

हमले की खबर से साफ लगता है कि यह उनकी आवाज दबाने की कोशिश है। उनके साथी और एक्स-मुस्लिम समुदाय के लोग कह रहे हैं कि यह इस्लामी कट्टरता का नतीजा है। सुबह की नमाज के तुरंत बाद हमला – यह संयोग नहीं लगता। यह दिखाता है कि ‘पवित्र’ समय को भी हिंसा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक्स-मुस्लिम के तौर पर मैं जानता हूं कि जब आप इस्लाम छोड़ते हैं या उसकी आलोचना करते हैं, तो पहले बहस, फिर धमकियां, और आखिर में हिंसा का रास्ता अपनाया जाता है। हदीसों में मुर्तद के लिए मौत की सजा का जिक्र है, और यह विचार आज भी कई जगहों पर जिंदा है। भारत जैसे सेकुलर देश में भी ऐसे हमले हो रहे हैं। सलीम जैसे लोग चुप रहते तो शायद सुरक्षित होते, लेकिन वे चुप नहीं रहे – क्योंकि चुप्पी से कट्टरता और मजबूत होती है।

 

समस्या कहां है? और हम क्या करें?

समस्या इस्लाम की मूल शिक्षाओं में नहीं, बल्कि उसकी सख्त, असहिष्णु व्याख्या में है। कट्टरपंथी किसी भी सवाल या सुधार को ‘इस्लाम पर हमला’ मान लेते हैं। अगर आपका विश्वास इतना मजबूत है, तो आलोचना से क्यों डर? बहस करो, तर्क दो, लेकिन चाकू क्यों?

एक्स-मुस्लिम समुदाय के लिए यह समय एकजुट होने का है। सलीम की जिंदगी दांव पर है। हमें चाहिए:

– सोशल मीडिया पर इसकी आवाज उठाएं, लेकिन सुरक्षित रहते हुए।

– पुलिस और सरकार से तेज जांच और सुरक्षा की मांग करें।

– अपनी कहानियां शेयर करें, ताकि अकेलापन कम हो।

– याद रखें – अगर सलीम चुप हो गए, तो अगला नंबर किसी और का हो सकता है।

सलीम भाई, जल्दी ठीक हो जाओ। तुम्हारी हिम्मत हम सबके लिए मिसाल है। हम तुम्हारे साथ हैं।

अगर आप भी एक्स-मुस्लिम हैं, या इस मुद्दे पर कुछ कहना चाहते हैं, तो कमेंट्स में अपनी राय रखें। चुप्पी हिंसा को बढ़ावा देती है – बोलना जरूरी है।

धन्यवाद,