दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद: बोहरा मुसलमानों की तरफ से जब जज के परिवार पर जानलेवा हमले और उनके और उनके परिवार को ‘श्मशान’ की धमकी मिलती है

दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद: बोहरा मुसलमानों की तरफ से जब जज के परिवार पर जानलेवा हमले और उनके और उनके परिवार को ‘श्मशान’ की धमकी मिलती है

इस्लाम छोड़ने के बाद  कई सारे मसले पर हम बात कर चुके हैं लेकिन आज जो एक अजीब बात मुझे समझ में आई, वो यह कि कई मुस्लिम समुदायों में असहमति या कानूनी फैसले को स्वीकार करने की बजाय धमकी, हिंसा और दबाव ही जवाब होता है। आज जो खबर सामने आई है, वो ठीक इसी मानसिकता को उजागर करती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस गौतम पटेल और उनका परिवार दाऊदी बोहरा समुदाय के उत्तराधिकार मामले के फैसले के बाद लगातार जानलेवा धमकियों का सामना कर रहा है। लंदन में उनकी बेटी पर हमला, पत्रों में ‘श्मशान’ की धमकी, वीडियो बनाकर फैसला वापस लेने की मांग – ये सब पढ़कर इस्लामी मानसिकता पर रोष पैदा होता हैं।

मामला क्या है?

दाऊदी बोहरा शिया इस्लाम का एक समुदाय है, जिसमें ‘दाई-उल-मुतलक’ का पद सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता का होता है। 2014 में 52वें दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन के निधन के बाद उनके बेटे मुफद्दल सैफुद्दीन ने पद संभाला। लेकिन उनके सौतेले भाई ख़ुजैमा कुतुबुद्दीन ने दावा किया कि 1965 में उन्हें गुप्त रूप से (नस्स) उत्तराधिकारी बनाया गया था।

यह विवाद 9 साल चला और 2024 में जस्टिस गौतम पटेल ने फैसला सुनाया कि मुफद्दल सैफुद्दीन ही वैध 53वें दाई हैं। फैसला कानूनी दस्तावेजों, गवाहों और सबूतों पर आधारित था। लेकिन समुदाय के कुछ प्रभावशाली लोग इसे मानने को तैयार नहीं। उन्होंने जज से मांग की कि वे विदेश जाकर यूट्यूब वीडियो जारी करें, स्वीकार करें कि फैसला गलत था, दबाव में दिया गया था। समय सीमा दी गई – सितंबर 2025 तक। जज ने मना कर दिया, तो परिवार पर हमले शुरू हो गए।

अगस्त 2025 में लंदन में बेटी अदिति के घर सेंधमारी, फिर पत्र जिसमें हमले की जिम्मेदारी ली गई। अप्रैल 2026 में अदिति पर सड़क पर नकाबपोश हमला – नाक टूट गई, लेकिन लूट नहीं की गई। जून 2026 में फिर मौत की धमकी। ये सब एक न्यायिक फैसले के खिलाफ है।

एक एक्स-मुस्लिम का क्या नजरिया है?

मैंने खुद इस्लाम छोड़ा, तो जानता हूं कि इस्लाम के नाम पर कितनी आसानी से हिंसा को जायज ठहराया जाता है। दाऊदी बोहरा समुदाय कई मामलों में अपने सदस्यों पर सख्त नियंत्रण रखता है – सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक दबाव, यहां तक कि ‘बरात’ (बहिष्कार) का डर। जब एक रिटायर्ड जज, जो स्वतंत्र रूप से फैसला देता है, को इस तरह निशाना बनाया जाता है, तो सवाल उठता है – क्या मज़हब न्याय से ऊपर है?

यह सिर्फ एक समुदाय का मामला नहीं है। यह पूरे इस्लामी जगत की समस्या है, जहां आलोचना या अलग राय को ‘दुश्मनी’ माना जाता है। पैगंबर, खलीफा, दाई –या अन्य किसी भी मज़हबी पद के उत्तराधिकार को लेकर इतिहास में खूनखराबा होता आया है। अली, हसन और हुसैन का क़त्ल भी इसी कारण हुआ था। इस्लाम क़त्ल से ही शुरू हुआ है और आज भी यही चल रहा है। जस्टिस पटेल ने कहा कि न्यायिक फैसला ‘वापस’ नहीं लिया जा सकता। लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी इसे नहीं समझना चाहते।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने लंदन में इस मुद्दे को उठाया, सुरक्षा का आश्वासन मिला। लेकिन क्या ये काफी है? भारत जैसे सेकुलर देश में क्या एक समुदाय न्यायपालिका को धमका सकता है? बॉम्बे बार एसोसिएशन ने भी इसकी निंदा की है।

हम क्या सीखें?

1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता: जजों को फैसला देने के बाद भी सुरक्षा मिलनी चाहिए। धमकियां लोकतंत्र पर हमला हैं।

2. धार्मिक सुधार: दाऊदी बोहरा जैसे समुदायों को अपने आंतरिक मामलों में पारदर्शिता लानी चाहिए। गुप्त ‘नस्स’ जैसी परंपराएं विवाद पैदा करती हैं।

3. एक्स-मुस्लिम आवाज: हम जो लोग बाहर आए हैं, वो बताते हैं कि अंधविश्वास और अंधभक्ति कितना नुकसान पहुंचाती है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, और आलोचना का अधिकार – ये बुनियादी हैं।

 

मैं उन सभी जजों और सच्चे न्यायप्रेमियों का सम्मान करता हूं जो दबाव में नहीं झुकते। जस्टिस पटेल साहब, आप मजबूत रहें। आपका फैसला इतिहास में दर्ज रहेगा।

मज़हब के नाम पर हिंसा कभी जायज नहीं। भारत में कानून सबसे ऊपर है – चाहे वो बोहरा हो, सुन्नी हो, या कोई और।

जय हिंद।

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