अल्लाह की “अज़ली इल्म” की बुनियाद पर सवाल

अल्लाह की “अज़ली इल्म” की बुनियाद पर सवाल

अल्लाह की “अज़ली इल्म” की बुनियाद पर सवाल

मुसलमानों को सिखाया जाता है कि अल्लाह सब कुछ जानने वाला है – माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल, कुछ भी उससे छिपा नहीं। लेकिन कुरान की आयतों को ग़ौर से पढ़ें तो कई जगह ये बुनियादी सिफ़त पर सवाल उठते हैं।

दो आयतें देखिए:

कुरान 8:65 “ऐ नबी! मोमिनों को जंग के लिए उकसाओ। अगर तुममें से 20 सब्र करने वाले हों तो 200 पर ग़ालिब आएँगे, और अगर 100 हों तो 1000 काफ़िरों पर ग़ालिब आएँगे।”

यानी अनुपात: 1 मोमिन : 10 काफ़िर – बहुत सख़्त माँग।

कुरान 8:66 “अब अल्लाह ने तुम पर से बोझ हल्का कर दिया और उसने जाना कि तुममें कमज़ोरी है। तो अगर तुममें से 100 सब्र करने वाले हों तो 200 पर ग़ालिब आएँगे, और अगर 1000 हों तो 2000 पर – अल्लाह की इजाज़त से।”

अनुपात अब 1:2 हो गया – बहुत आसान।

आयत साफ़ कहती है कि ये बदलाव तब हुआ जब अल्लाह ने “जाना” (عَلِمَ) कि मोमिनों में कमज़ोरी है। यानी पहले वाली सख़्त हुकूमत के बाद कमज़ोरी का एहसास हुआ, फिर नियम ढीला किया।

क़ुर्तुबी की तफ़सीर में इब्न अब्बास से: पहली आयत (1:10) नाज़िल हुई तो मोमिनों पर भारी पड़ गई। साथी परेशान हुए। फिर राहत वाली आयत (1:2) आई।

सवाल

अल्लाह जैसा सर्वज्ञ और हकीम पहली बार 1:10 का सख़्त नियम क्यों देता? फिर साथियों के परेशान होने पर “जानकर” नियम ढीला क्यों करता?

“عَلِمَ” (आलिमा) का मतलब “जानना, एहसास होना, नई जानकारी हासिल करना” है – इंसानी स्टाइल। अगर अल्लाह का इल्म अज़ली होता तो आयत में “कान यअलमु” (पहले से जानता था) इस्तेमाल होता। लेकिन “आलिमा” का इस्तेमाल ये बताता है कि जानकारी बाद में हासिल हुई।

पैरोकारों का बहाना: “अल्लाह पहले से जानता था”

कहते हैं “आलिमा” का मतलब “पहले से जानता था”।

जवाब: अगर पहले से जानता था तो शुरू में ही ग़ैर-मुमकिन नियम क्यों दिया? ये “टेस्ट” था कहते हैं – लेकिन ऐसा टेस्ट जिसमें सारे साथी फ़ेल हो जाएँ और फिर नियम 5 गुना ढीला कर दिया जाए? ये दैवी हिकमत नहीं – इंसानी ट्रायल-एंड-एरर है।

आयत 3:140 में फिर “जानना”

“अगर तुम्हें ज़ख़्म पहुँचा है तो दूसरे लोगों को भी वैसा ज़ख़्म पहुँचा था… ये दिन हम लोगों के बीच बदलते हैं ताकि अल्लाह जाने कौन ईमान लाए।”

“लियअलमा” (ताकि जाने) – फिर अल्लाह का “जानना” किसी काम पर मशरूत। लेकिन उहुद में सारे मुसलमान ईमान वाले ही रहे – फ़रार होने वाले भी। तो “जानने” की ज़रूरत क्या थी?

आयत 48:18 में फिर “फ़आलिमा”

“अल्लाह मोमिनों से राज़ी हुआ जब वो पेड़ के नीचे बैअत कर रहे थे, फिर उसने जाना उनके दिलों में क्या है, तो उनपर सकीना नाज़िल की।”

“फ़आलिमा” – “फिर जाना”। यानी बैअत के बाद दिलों का हाल जाना।

पैरोकारों की ट्रांसलेशन में हेर-फेर 50+ ट्रांसलेटर “फ़आलिमा” को “and He knew” कहते हैं। लेकिन उसी आयत में दूसरा “फ़अ” (फ़अन्ज़ला) को “then He sent down” कहते हैं। एक ही “फ़” का मतलब अलग-अलग क्यों? साफ़ थियोलॉजिकल बायस – अज़ली इल्म बचाने के लिए।

नतीजा

  • आयतें अल्लाह को इंसानी स्टाइल में “जानने” वाला दिखाती हैं – पहले नहीं पता, बाद में पता चला।
  • नियम पहले सख़्त, फिर नाकामी के बाद ढीले।
  • ये सर्वज्ञ अल्लाह की वह्य नहीं – इंसानी फ़ैसले हैं जो हालात देखकर बदलते हैं।

अक़्ल रखने वालों के लिए सोचने का मौक़ा।

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