अज़्ल: बच्चे को ज़िन्दा दफ़न करना या नहीं?

अज़्ल: बच्चे को ज़िन्दा दफ़न करना या नहीं?

‘अज़्ल (عزل) का मतलब है हमबिस्तरी के दौरान इजाक़ (वीर्यपात) से पहले पुरुष अंग बाहर निकाल लेना ताकि गर्भ न ठहरे।

मुहम्मद ने शुरू में ‘अज़्ल को बच्चे को ज़िन्दा दफ़न करना बताया, लेकिन बाद में साथियों की सेक्सुअल ख़्वाहिशों और पैसे की लालच के लिए इसे जायज़ कर दिया।

आसमान पर कोई अल्लाह नहीं था, इसलिए पहले मुहम्मद ने यहूदियों की रिवायत के मुताबिक़ ‘अज़्ल को बच्चे को ज़िन्दा दफ़न करने के बराबर बताया।

सहीह मुस्लिम 1442b नबी ﷺ ने फरमाया: “मैं दूध पिलाने वाली औरतों से हमबिस्तरी रोकने वाला था, लेकिन रोमियों और फारसियों को देखा – वो ऐसा करते हैं और उनके बच्चों को कोई नुक़सान नहीं होता।” फिर ‘अज़्ल के बारे में पूछा गया तो बोले: “ये बच्चे को छिपकर ज़िन्दा दफ़न करना है।”

बाद में जब मुसलमान ताक़तवर हुए और जंगों में औरतें क़ैदी बनाकर लाते, तो उन्हें रखैल बनाकर रेप करते (जो इस्लाम में जायज़ है)। लेकिन साथी चाहते थे कि औरतें हामिला न हों ताकि उन्हें ज़्यादा क़ीमत पर बेच सकें या लंबे समय तक सेक्सुअल सेवाएँ ले सकें।

इसलिए साथियों ने क़ैदी और ग़ुलाम औरतों के साथ ‘अज़्ल करना शुरू कर दिया ताकि वो हामिला न हों और मज़े भी लूटें और क़ीमत भी बनी रहे।

ये मुहम्मद के लिए मुश्किल बन गया। साथियों की ख़्वाहिश और लालच को पूरा करना था। तो मुहम्मद ने उल्टा फ़ैसला सुनाया – क़ैदी और ग़ुलाम औरतों के साथ ‘अज़्ल पूरी तरह जायज़ है, और बोले: “अगर बच्चा पैदा होना लिखा है तो हो जाएगा।”

सहीह मुस्लिम (किताबुन्निकाह), सहीह बुखारी (किताबुल क़द्र और तौहीद) अबू सईद ख़ुदरी से: बनी मुस्तलिक़ की जंग में हमने अच्छी अरब औरतें क़ैदी बनाईं। हमें उनसे सेक्स की ख़्वाहिश थी क्योंकि बीवियाँ दूर थीं – और रैनसम का पैसा भी चाहिए था। हमने ‘अज़्ल करके सेक्स करने का फ़ैसला किया ताकि हामिला न हों और अच्छी क़ीमत मिले। फिर सोचा: नबी ﷺ हमारे बीच हैं, उनसे पूछ लें। पूछा तो बोले: “करो या न करो – फ़र्क़ नहीं पड़ता। जो रूह क़यामत तक पैदा होनी है, वो हो जाएगी।”

तनाक़ुज़ साफ़ हैं

  • पहले: ‘अज़्ल = बच्चे को छिपकर ज़िन्दा दफ़न (बड़ा गुनाह)
  • बाद में: ‘अज़्ल = बिल्कुल जायज़ (ख़ासकर ग़ुलामों के साथ)

पैरोकार कहते हैं कि पहले वाला सिर्फ़ “मकरूह” था। लेकिन “छिपकर बच्चे को ज़िन्दा दफ़न” को सिर्फ़ “नापसंद” कैसे कह सकते हो? ये तो क़त्ल है।

एक और तनाक़ुज़:

  • आज़ाद औरतों के साथ ‘अज़्ल: मना या नापसंद (बच्चे को दफ़न जैसा)
  • ग़ुलाम/क़ैदी औरतों के साथ: पूरी तरह जायज़

फ़ितरत में फ़र्क़ नहीं – गर्भ रोकना एक ही है, औरत आज़ाद हो या ग़ुलाम। या तो दोनों में बच्चा “दफ़न” होता है – या किसी में नहीं।

हक़ीक़त

मुहम्मद ख़ुद कहते हैं: “मैंने रोकने का इरादा किया…” “मैंने रोमियों-फारसियों को देखा…” अल्लाह का ज़िक्र कहीं नहीं। फ़ैसले मुहम्मद की पर्सनल सोच और ज़रूरतों से थे।

अगर रोम-फ़ारस की बात न पता होती तो दूध पिलाने वाली माँओं से सेक्स हराम होता – वो सिर्फ़ दूध की मशीनें बनकर रह जातीं।

इसी तरह हामिला औरतों पर ग़लत ख़्याल (“दूसरे मर्द का मनी बच्चे को पोषण देगा”) की वजह से विधवा/तलाक़शुदा हामिला औरतें दोबारा शादी नहीं कर सकतीं – सबसे ज़्यादा प्यार-सपोर्ट की ज़रूरत के वक़्त अकेली रहती हैं।

नतीजा

मुहम्मद के फ़ैसले हालात के साथ बदलते थे:

  • शुरू में सख़्ती (यहूदियों से प्रभाव)
  • बाद में ढील (साथियों की ख़्वाहिश और लालच के लिए)

ये सर्वज्ञ अल्लाह की वह्य नहीं – मुहम्मद की ज़रूरतों के मुताबिक़ बनाए गए क़ानून थे।

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