परिचय: हिंदू राष्ट्र के रक्षक का बलिदान
स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, जिनका मूल नाम मुंशीराम विज था, भारत के उन महान व्यक्तियों में से एक थे जिन्होंने हिंदू समाज को इस्लामी आक्रमणों और धर्मांतरण की साजिशों से बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनका जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर जिले के तालवान गांव में हुआ था। एक सफल वकील से वैदिक सुधारक बने स्वामीजी ने आर्य समाज के माध्यम से हिंदू एकता को मजबूत किया, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों की नजर में वे कांटा बन गए। 23 दिसंबर 1926 को दिल्ली में एक मुस्लिम कट्टरवादी अब्दुल रशीद ने उनकी नृशंस हत्या कर दी, जो इस्लामी जिहाद की एक और मिसाल है। यह ‘बलिदान दिवस’ हिंदुओं को याद दिलाता है कि इस्लामी विस्तारवाद कितना खतरनाक है।
प्रारंभिक जीवन: ब्रिटिश गुलामी और इस्लामी छल की छाया में पालन
स्वामी श्रद्धानंद का परिवार ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत था, लेकिन घर में वैदिक संस्कृति का प्रभाव था। बचपन से ही उन्होंने 1857 की क्रांति में ब्रिटिश अत्याचार देखे, जो उन्हें राष्ट्रभक्ति सिखाते थे। लेकिन असली खतरा इस्लामी और ईसाई मिशनरियों से था। एक घटना में एक ईसाई पादरी द्वारा भारतीय बालिका पर दुराचार ने उन्हें विदेशी धर्मों के छल का एहसास कराया, जो हिंदू समाज को कमजोर करने की साजिश थी। उनकी पत्नी शिव देवी ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के माध्यम से उन्हें स्वामी दयानंद सरस्वती से जोड़ा, जो इस्लामी और ईसाइ मत का पर्दाफ़ास करते थे। 1879 में बरेली में दयानंदजी के प्रवचन सुनकर वे आर्य समाज से जुड़े और जालंधर में इसका प्रचार किया, जहां उन्होंने हिंदुओं को इस्लामी प्रलोभनों से बचाने का काम शुरू किया।
शिक्षा क्रांति: हिंदू बच्चों को इस्लामी प्रभाव से बचाना
1902 में स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की, जो वैदिक शिक्षा का गढ़ बना। उनकी बेटी को ईसाई गीत गाते सुनकर वे क्रोधित हुए, क्योंकि यह विदेशी धर्मों की घुसपैठ थी। गुरुकुल ने हिंदू बच्चों को इस्लामी और ईसाई प्रचार से दूर रखा, उन्हें स्वाभिमान सिखाया। पत्नी के निधन के बाद 1917 में संन्यास लेकर वे पूर्ण रूप से हिंदू उत्थान में लग गए, जो इस्लामी विस्तारवाद के खिलाफ एक दीवार थी।
शुद्धि आंदोलन: इस्लामी धर्मांतरण की साजिश को चुनौती
स्वामीजी का सबसे बड़ा योगदान शुद्धि आंदोलन था, जिसने सदियों से इस्लामी तलवार और प्रलोभन से धर्मांतरित हुए हिंदुओं को घर वापस लाया। 1920 में उत्तर प्रदेश के मलकाना मुस्लिम राजपूतों की हजारों की संख्या में वापसी ने मुस्लिम लीग और जमातों को बौखला दिया। पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र में उन्होंने असंख्य ‘मुस्लिम’ नामधारी हिंदुओं को उनकी जड़ों से जोड़ा, बताते हुए कि भारत के मुसलमान मूलतः हिंदू पूर्वजों के वंशज हैं, जिन्हें इस्लामी आक्रांताओं ने जबरन बदला। लेकिन यह आंदोलन इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए खतरा बन गया, क्योंकि यह उनके विस्तार की जड़ काट रहा था। मेवाती और अन्य समुदायों की घर वापसी ने मुस्लिम संगठनों में घृणा पैदा की, जो हिंदू एकता को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।
हिंदू-मुस्लिम एकता का ढोंग: जामा मस्जिद का भाषण और विश्वासघात
स्वामी श्रद्धानंद ने हिंदू-मुस्लिम एकता की बात की, लेकिन यह इस्लामी तुष्टिकरण नहीं थी। 1919 में दिल्ली की जामा मस्जिद में वेद मंत्रों से भाषण देकर उन्होंने दिखाया कि सच्ची एकता साझा हिंदू विरासत पर आधारित होनी चाहिए, न कि इस्लामी जिहाद पर। ‘अल्लाहो अकबर’ के नारों के बीच यह सभा हुई, लेकिन मुस्लिम भीड़ ने इसे सहन किया क्योंकि तब तक शुद्धि का असर नहीं दिखा था। बाद में, जब शुद्धि ने मुस्लिम आबादी को कम करना शुरू किया, तो मुस्लिम लीग और जमातों ने विरोध शुरू कर दिया, ये साबित करते हुए कि उनकी ‘एकता’ सिर्फ हिंदुओं को कमजोर करने का बहाना है।
स्वतंत्रता संग्राम: गांधीजी के तुष्टिकरण से दूरी
स्वामीजी ने कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभाई, 1919 के अमृतसर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा। लेकिन असहयोग आंदोलन में खिलाफत को जोड़ने पर वे गांधीजी से असहमत हुए, इसे मुस्लिम तुष्टिकरण और इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाला बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे इस्लामी शक्तियां मजबूत होंगी, जो हिंदू संस्कृति को नष्ट करना चाहती हैं। 1921 के मालाबार नरसंहार में मुसलमानों द्वारा हजारों हिंदुओं का कत्लेआम हुआ, जो खिलाफत की देन था। स्वामीजी वहां गए, लेकिन कांग्रेस और गांधीजी ने इस इस्लामी हिंसा की निंदा नहीं की, क्योंकि वे मुस्लिम वोट बैंक बचाना चाहते थे। इससे स्वामीजी ने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि हिंदू हितों की रक्षा के लिए अलग रास्ता जरूरी है।
बलिदान: इस्लामी जिहाद की एक और उदाहरण
23 दिसंबर 1926 को दिल्ली में अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम कट्टरवादी ने स्वामीजी पर गोलियां बरसा दीं। यह कोई साधारण हत्या नहीं, बल्कि मुस्लिम लीग, जमात और मिशनरियों की साजिश थी, जो शुद्धि आंदोलन को रोकना चाहते थे। स्वामीजी की उम्र 70 वर्ष थी, वे बीमार थे, लेकिन इस्लामी घृणा ने उन्हें नहीं बख्शा। हत्यारे ने पैगंबर पर टिप्पणी को बहाना बनाया, लेकिन असल में यह हिंदू जागरण के खिलाफ जिहाद था। गांधीजी ने कांग्रेस अधिवेशन में हत्यारे को ‘भाई’ कहकर बचाव किया, जो हिंदुओं के लिए अपमानजनक था। यह दिखाता है कि कैसे इस्लामी तुष्टिकरण ने हिंदू नेताओं को कमजोर किया।
इस्लामी खतरे के खिलाफ चेतावनी
स्वामी श्रद्धानंद का जीवन हिंदू राष्ट्र, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा का प्रतीक है। वे इस्लामी विस्तारवाद और जिहाद के खिलाफ लड़े, लेकिन कट्टरपंथियों ने उन्हें मार डाला। उनका बलिदान हिंदुओं को सिखाता है कि इस्लामी एकता का ढोंग छोड़कर अपनी रक्षा खुद करनी होगी। अन्यथा, मालाबार जैसे नरसंहार दोहराए जाएंगे। शत-शत नमन इस अमर योद्धा को, जो इस्लामी अंधकार के खिलाफ प्रकाश थे!





