हजारीबाग में मां सरस्वती की पूजा के दौरान मजहबी उन्माद; कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीर अंदाज़ में पथराव… हिन्दू पर्वों पर दिख रहा हिन्दूफोबिया

हजारीबाग में मां सरस्वती की पूजा के दौरान मजहबी उन्माद; कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीर अंदाज़ में पथराव… हिन्दू पर्वों पर दिख रहा हिन्दूफोबिया

भाई, मैं एक एक्स-मुस्लिम हूं। जो लोग मुझे जानते हैं, वो जानते हैं कि मैंने इस्लाम को क्यों छोड़ा – क्योंकि मैंने देखा कि उसकी किताब और उसकी सिखाई में कितनी सख्ती, कितनी असहिष्णुता है। आज जब मैं ये हजारीबाग की घटना सुनता हूं, तो पुराना दर्द फिर ताजा हो जाता है। 24 जनवरी 2026, बेलतु गांव, केरेडारी ब्लॉक – मां सरस्वती की मूर्ति विसर्जन का जुलूस। बच्चे, लड़कियां, माताएं, सब खुशी-खुशी “विद्या की देवी” को विदाई दे रहे थे। DJ पर भजन बज रहे थे, नारे लग रहे थे, मिठाई बांट रहे थे। ये हिंदू संस्कृति की वो मासूमियत थी, जो मैंने कभी नहीं जानी, लेकिन अब समझता हूं कि ये कितनी खूबसूरत है।

और फिर… पत्थर! मुस्लिम भीड़ ने “DJ का गाना भड़काऊ लगा” कहकर हमला कर दिया। मूर्ति पर पत्थर, जुलूस पर पत्थर, पुलिस वालों पर भी पत्थर। कई घायल, बच्चियां रो रही थीं, माताएं मूर्ति को बचाने के लिए ढाल बन गईं। पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी। इलाका पुलिस छावनी बन गया। ये कोई “दो समुदायों का झगड़ा” नहीं था – ये था साफ-साफ इस्लामी असहिष्णुता का नंगा रूप।

मैंने कुरान पढ़ी है, हदीस पढ़ी हैं। वहां मूर्ति पूजा को “शिर्क” कहा गया है – सबसे बड़ा गुनाह। “हराम” है गाना-बजाना, “हराम” है ऐसी पूजा। तो जब कोई हिंदू अपनी पूजा कर रहा हो, तो वो “प्रोवोकेशन” बन जाता है। और प्रोवोकेशन का जवाब? हिंसा! पत्थरबाजी! ये वही मेंटालिटी है जो कश्मीर में हिंदुओं को काट-काटकर भगाती है, जो अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध तोड़ती है, जो पाकिस्तान में मंदिर जला देती है। और भारत में भी यही हो रहा है – सरस्वती पूजा हो, रामनवमी हो, गणेशोत्सव हो – हर त्योहार पर टारगेट।

मैं एक्स-मुस्लिम हूं, इसलिए मैं चुप नहीं रह सकता। मैं जानता हूं कि ज्यादातर मुस्लिम अच्छे लोग हैं, लेकिन ये कट्टर सोच, ये “हमारा तरीका ही सही” वाली मानसिकता, ये “गैर-मुस्लिम की खुशी बर्दाश्त नहीं” वाली बीमारी – ये इस्लाम की मूल शिक्षाओं से ही आती है। कुरान में सूरह 9:29 पढ़ो – गैर-मुस्लिमों को जजिया दो या जिहाद करो। सूरह 9:5 – मूर्तिपूजकों को मार डालो। ये बातें आज भी मस्जिदों में पढ़ी जाती हैं, मदरसों में सिखाई जाती हैं। नतीजा? ऐसे हमले।

मेरा दिल रो रहा है उन हिंदू भाइयों-बहनों के लिए जो सिर्फ अपनी देवी की पूजा कर रहे थे और पत्थर खा रहे थे। एक बच्ची का सिर फट गया होगा, कोई मां रो रही होगी। और मीडिया? “दोनों पक्ष”, “सांप्रदायिक तनाव”। अगर हिंदू ईद पर पत्थर मारते, तो “हिंदू आतंकवाद” का शोर मच जाता। लेकिन यहां? चुप्पी, या “शांति बनाए रखो” का लेक्चर।

मैं हिंदुओं से कहता हूं – डरो मत। अपनी संस्कृति बचाओ। कानून का सहारा लो, लेकिन झुको मत। और मुस्लिम भाइयों से – अगर तुम सच में शांति चाहते हो, तो इस कट्टर सोच को छोड़ो। मूर्ति पूजा तुम्हारे लिए गलत हो सकती है, लेकिन वो किसी की आस्था है। पत्थर मारकर क्या साबित करोगे? सिर्फ यही कि इस्लाम में सहिष्णुता नाम की कोई चीज नहीं बची।

मां सरस्वती सबको बुद्धि दें – खासकर उनको जो हिंसा से जवाब देते हैं। जय मां सरस्वती! और ऐसे उन्माद को कभी बर्दाश्त नहीं।

https://www.sudarshannews.in/violence-during-saraswati-puja-immersion-in-hazaribagh-stone-pelting-extremists-several-injured-136737-newsdetails.aspx#google_vignette

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