मैं यह लेख उन तमाम मोमिनो को समर्पित करता हूँ जो इस दुनिया को एक इम्तिहान की जगह समझते हैं। वे मानते हैं कि अल्लाह ने हर इंसान को आज़ाद इच्छाशक्ति (फ्री विल) देकर इस ज़मीन पर भेजा है ताकि देखा जाए कि कौन नेक अमल करता है और कौन गुनाह। मौत के बाद सबके कर्मों का हिसाब होगा और उसी के मुताबिक जन्नत या जहन्नुम मिलेगी।
भाइयो, एक रात सोने से पहले अपना मोबाइल एक तरफ रखकर गहराई से सोचिए। अगर अल्लाह सच में हमें आज़माने के लिए फ्री विल देता है और मौत तक की मोहलत, तो नेक कामों में तो कोई दिक्कत नहीं। किसी गरीब को पैसा देना, पानी पिलाना, खाना खिलाना, कपड़े देना या बेघर को छत देना – ये सब अच्छे काम हैं, सबको मंज़ूर।
लेकिन बुरे कामों में एक बहुत बड़ी समस्या है। मान लीजिए मैं चोरी करता हूँ, डकैती करता हूँ, किसी का कत्ल कर देता हूँ या बलात्कार। मेरी तो आज़माइश हो गई – अल्लाह देखना चाहता था कि मैं गुनाह करता हूँ या नहीं। मैं गुनाह कर बैठा, टेस्ट में फेल हो गया। अल्लाह मुझे सज़ा देगा, चाहे दुनिया में या आखिरत में। मेरा मामला तो साफ है।
लेकिन उस शख्स का क्या जिसके घर में मैंने चोरी की? उस बेकसूर का क्या कसूर था? मैंने उसकी खून-पसीने की कमाई लूट ली। न जाने कितनी मेहनत से, कितनी मुश्किलों से उसने वो पैसे जोड़े होंगे – गालियाँ सहीं, हाथ जोड़े, पेट काटकर बचत की। और मैंने एक झटके में सब छीन लिया। उसके नुकसान में उसकी क्या गलती थी?
अब और आगे सोचिए। अगर चोरी करते वक्त वो जाग जाए और मुझे रोकने की कोशिश करे – अपनी मेहनत की कमाई बचाने के लिए, जो शायद उसके बच्चों की पढ़ाई, शादी या बीमार बच्चे के इलाज के लिए थी। हाथापाई होती है और गुस्से में मैं उसका कत्ल कर देता हूँ। अब बताइए, उसकी मौत का ज़िम्मेदार कौन? मैं? या अल्लाह, जो मेरी आज़माइश ले रहा था?
अल्लाह तो सब कुछ जानने वाला है। मुझे पैदा करने से पहले ही पता था कि मैं क्या करूँगा। फिर टेस्ट लेने की क्या ज़रूरत? और अगर लेना ही था, तो मेरे हाथों एक बेकसूर की चोरी क्यों? उसकी हत्या क्यों? उस मासूम का क्या कसूर था?
बात समझ नहीं आ रही? तो एक और मिसाल देता हूँ। मुआफ़ी चाहता हूँ, क्योंकि यह मिसाल बहुत संवेदनशील है, लेकिन दर्द को समझने के लिए कभी-कभी खुद के करीब की कल्पना करनी पड़ती है।
मान लीजिए आप और आपकी बहन रात में सुनसान सड़क पर जा रहे हैं। कुछ गुंडे बाइक पर आते हैं, आपकी बहन से छेड़खानी करते हैं। वो आपको “भैया” कहकर मदद माँगती है। आप लड़ते हैं, कुछ को गिरा देते हैं। लेकिन बाकी गुंडे आपकी बहन के साथ ज़बरदस्ती करते हैं, उसके कपड़े फाड़ते हैं और बलात्कार कर डालते हैं।
उस वक्त आप क्या करेंगे? क्या चुपचाप खड़े रहेंगे और सोचेंगे कि अल्लाह उन गुंडों का टेस्ट ले रहा है? कि मौत के बाद उन्हें जहन्नुम में सज़ा मिलेगी? नहीं। आप गुस्से में आकर खुद उनसे लड़ेंगे, खुद सज़ा देने की कोशिश करेंगे। उस वक्त अल्लाह का इंसाफ, आखिरत की सज़ा – सब भूल जाएँगे।
लेकिन अगर आप बहन को बचा न पाएँ और गुंडे उसकी इज़्ज़त लूट लें, तो सोचिए – आपकी बहन का क्या कसूर था? अल्लाह उन गुंडों का बेवजह टेस्ट ले रहा था (जबकि रिज़ल्ट पहले से पता था) और इसके लिए एक मासूम लड़की को बलि का बकरा बना दिया?
हर रोज़ दुनिया में करोड़ों लोग लूटे जाते हैं, कत्ल होते हैं, मासूम बच्चियाँ – दो-तीन-चार साल की बच्चियाँ तक – बलात्कार का शिकार बनती हैं। और आप कहते हैं कि यह सब गुंडों-चोरों का टेस्ट है? तो माफ़ कीजिए, ऐसे खुदा की इबादत करने पर शर्म आनी चाहिए।
अगर कोई अल्लाह है भी, तो वो खुदा कहलाने लायक नहीं। वो शैतान से भी बदतर है। उसे किसी के दर्द का एहसास नहीं। वो खुद ज़ालिम पैदा करता है, उनके हाथों मासूमों पर ज़ुल्म करवाता है – चोरी, कत्ल, बलात्कार – और फिर उन ज़ालिमों को जहन्नुम में जलाकर मज़ा लेता है।
यह दोहरा ज़ुल्म है: एक तो मज़लूमों पर – क्योंकि ज़ालिम को उसी ने बनाया और सब जानते हुए भी ज़ुल्म होने दिया। दूसरा ज़ालिमों पर – ज़ुल्म करवाकर फिर हमेशा की सज़ा।
चाहे इसे बदला कहें या सज़ा, हकीकत यही है कि यह सरासर ज़ुल्म है। सरासर ज़ुल्म है। सरासर ज़ुल्म है।
यह लेख सिर्फ सोचने के लिए है। शायद कभी हम सच का सामना करें।





