इस्लाम में ग़ुलामों की गवाही को “इंसानी” नहीं माना गया – कोर्ट में उनकी कोई वैल्यू नहीं

इस्लाम में ग़ुलामों की गवाही को “इंसानी” नहीं माना गया – कोर्ट में उनकी कोई वैल्यू नहीं

इस्लामी शरीयत के तहत एक तरफ़ तो ग़ुलाम औरत का एक अकेला बयान ही काफ़ी था कि कोई शख़्स उसके साथ यौन संबंध बना सके (यानी अगर वो औरत कहे कि मेरे मालिक ने मुझे आपको हलाल कर दिया है, तो उस पर यक़ीन करके उसके साथ हमबिस्तरी जायज़ थी)।

लेकिन दूसरी तरफ़, अल्लाह/मुहम्मद ने ग़ुलामों को इतना भी “इंसान” नहीं माना कि उनकी गवाही कोर्ट में किसी भी गंभीर मामले में क़बूल की जाए।

इमाम इब्न कुदामा ने अपनी किताब अल-मुग़नी में लिखा: “मालिक, अबू हनीफ़ा, शाफ़ई और ज़्यादातर उलेमा का कहना है: ग़ुलाम की गवाही जायज़ नहीं है।”

इमाम शाफ़ई ने अहकामुल कुरान (जिल्द 2, सफ़्हा 142) में लिखा: “गवाही आज़ाद मर्दों से होनी चाहिए, ग़ुलामों से नहीं। साथ ही ये आज़ाद मर्द हमारे दीन (इस्लाम) के होने चाहिए, ग़ैर-मुस्लिम आज़ाद मर्दों की गवाही भी क़बूल नहीं।”

इमाम अब्दुल्लाह इब्न अबी ज़ैद ने अपनी फ़िक़्ह किताब में लिखा: “हद (सज़ा पा चुके), ग़ुलाम, नाबालिग़ और काफ़िर की गवाही क़बूल नहीं।”

ध्यान दें कि इस्लाम में:

  • एक बहुत बड़ा ग़लत फ़हमी है कि आज़ाद मुस्लिम औरत की गवाही “आधी” होती है। नहीं—गंभीर “हुदूद” मामलों (जैसे औरत का बलात्कार, क़त्ल, चोरी, डकैती) में आज़ाद मुस्लिम औरत की गवाही भी “ज़ीरो” है। उसकी गवाही सिर्फ़ माली मामलों में “आधी” मानी जाती है।
  • इसके मुक़ाबले में ग़ुलामों की गवाही हर हाल में पूरी तरह रद्द थी—चाहे कोई भी मामला हो। उसकी कोई वैल्यू नहीं थी, न आधी गवाही के बराबर।

मिसाल के तौर पर:

  • अगर कोई आज़ाद मर्द किसी ग़ुलाम मर्द पर हमला करे, तो उस ग़ुलाम या किसी और ग़ुलाम की गवाही क़बूल नहीं होगी।
  • अगर कोई आज़ाद मुस्लिम मर्द किसी ग़ुलाम औरत के साथ ज़िना करे, तो न उस औरत की गवाही क़बूल होगी, न किसी और ग़ुलाम औरत की जो गवाह हो, और न ही किसी आज़ाद मुस्लिम औरत की (क्योंकि बलात्कार हुदूद मामला है)।
  • यही हाल ग़ैर-मुस्लिम मर्दों और औरतों का था। इस्लामी रियासत में उनकी गवाही किसी आज़ाद मुस्लिम मर्द के ख़िलाफ़ क़बूल नहीं होती थी—अल्लाह/मुहम्मद ने उन्हें इसी से ज़लील करना चाहा।

नोट: एक वाक़िया है जिसमें पैगंबर ने एक ग़ुलाम औरत की गवाही क़बूल की थी—दूध पिलाने (रज़ाअत) से जुड़ा मामला। लेकिन सलफ़ के फ़क़ीहों के मुताबिक़ ये “निजी और औरतों से जुड़े छोटे मामले” थे जिनमें ग़ुलाम औरतों की गवाही क़बूल हो सकती थी। मिसाल के तौर पर, अगर ग़ुलाम औरत कहे कि उसका हयज़ ख़त्म हो गया है, तो उसकी बात पर यक़ीन करके उसका नया मालिक उसके साथ हमबिस्तरी शुरू कर सकता था।

इस एक अपवाद को छोड़कर, हदीस और कुरान की पूरी किताबों में ऐसा कोई और वाक़िया नहीं मिलता जहाँ ग़ुलामों की गवाही क़बूल हुई हो। शुरुआती मुसलमानों का इस बात पर इज्मा था कि ग़ुलाम की गवाही अमान्य है।