नमस्कार दोस्तों,
मैं एक भारतीय एक्स मुस्लिम हूँ, जो इस्लाम की कट्टरता से तंग आकर बाहर निकला हूँ। आज मैं इस्लाम की आलोचना करने वाले एक लेखक के रूप में आपके सामने हूँ। मैंने इस्लाम की किताबों, इतिहास और वर्तमान व्यवहार को गहराई से पढ़ा है, और मुझे लगता है कि इसकी कुछ शिक्षाएँ और कट्टर अनुयायी तंत्र, सहिष्णुता और मानवता के लिए खतरा हैं। आज मैं उस लेख पर आधारित एक ब्लॉग लिख रहा हूँ जो रमजान के दौरान हिंदुओं पर होने वाली हिंसा को उजागर करता है। यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथ की गहरी जड़ों से उपजा पैटर्न है। मैं इसे एक एक्स मुस्लिम की आँखों से देखता हूँ, जहाँ मैंने खुद देखा है कि कैसे ‘काफिरों’ (गैर-मुसलमानों) के प्रति घृणा को मजहबी शिक्षा में घोल दिया जाता है। आइए, इस साजिश को बेनकाब करें।
रमजान: शांति का मुखौटा, हिंसा का असली चेहरा
रमजान को इस्लाम में इबादत और शांति का महीना कहा जाता है, लेकिन भारत जैसे बहुलतावादी देश में यह हिंदुओं के लिए खतरे का महीना बन जाता है। लेख में वर्णित घटनाएँ बताती हैं कि जैसे ही रमजान शुरू होता है, कट्टर मुसलमानों के गिरोह हिंदू शोभायात्राओं, मंदिरों और त्यौहारों पर हमला बोल देते हैं। यह कोई नई बात नहीं है; कुरान और हदीसों में ‘काफिरों’ से लड़ने की बातें हैं, जो कट्टरपंथियों को प्रेरित करती हैं। मैंने खुद मुसलमान रहते हुए देखा है कि कैसे मस्जिदों में प्रवचनों में हिंदुओं को ‘मुशरिक’ (मूर्तिपूजक) कहकर नफरत फैलाई जाती है। रमजान में रोजा रखने वाले ये लोग दिन में भूखे रहते हैं, लेकिन शाम होते ही हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। क्या ये मानवता के लिए सही है ? नहीं लेकिन यह इस्लाम की शिक्षा इसे जायज ठहराती है।
कर्नाटक में शिवाजी जयंती पर हमला: पुलिस तक को नहीं बख्शा
लेख में कर्नाटक के बागलकोट की घटना का जिक्र है, जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज की शोभायात्रा पर मस्जिद से पत्थर, जूते और चप्पल फेंके गए। पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ गोयल तक घायल हो गए। एक एक्स मुस्लिम के रूप में मैं कहता हूँ कि यह ‘जिहाद’ की मानसिकता है। इस्लाम में ‘काफिरों’ के जुलूस को मस्जिद के सामने से गुजरने नहीं देने का फतवा आम है। डीजे की आवाज का बहाना बनाकर हिंसा? यह हास्यास्पद है! मैंने मदरसों में पढ़ा है कि कैसे ‘इस्लामी इलाकों’ में गैर-मुसलमानों की धार्मिक अभिव्यक्ति को दबाना इस्लाम की रक्षा’ माना जाता है। शिवाजी महाराज, जो मुगलों के खिलाफ लड़े, उनके सम्मान पर हमला इस्लामी विस्तारवाद की हार की याद दिलाता है, जो कट्टरपंथियों को बर्दाश्त नहीं।
मध्य प्रदेश में दुर्गा मंदिर पर प्रहार: आस्था का अपमान
जबलपुर के सिहोरा में दुर्गा मंदिर की ग्रिल तोड़ना और फिर पत्थरबाजी – यह घटना इस्लामी कट्टरता का क्लासिक उदाहरण है। आरती और नमाज एक साथ होने पर हिंसा? लेख सही कहता है कि यह हिंदुओं की श्रद्धा पर हमला है। मैं आलोचना करता हूँ कि इस्लाम में ‘इदोलेट्री’ (मूर्तिपूजा) को हराम माना जाता है, जो कट्टर मुसलमानों को मंदिरों को अपवित्र करने के लिए उकसाता है। पुलिस ने 20 लोगों को पकड़ा, लेकिन जड़ समस्या है – मदरसों और मस्जिदों में फैलाई जा रही नफरत। एक पूर्व मुसलमान के तौर पर मैं कहता हूँ कि अगर इस्लाम सुधार नहीं होता, तो ऐसी घटनाएँ रुकेंगी नहीं।
आंध्र प्रदेश और हैदराबाद: ‘मंदिर बनाएँगे’ पर बवाल
हैदराबाद के अंबरपेट में शिवाजी जयंती जुलूस पर ‘मंदिर बनाएँगे’ गाने के कारण हिंसा। कट्टरपंथियों ने संगीत पर आपत्ति जताई और धारा 144 लगानी पड़ी। यह विडंबना है कि जहाँ अजान के लाउडस्पीकर पूरे दिन गूँजते हैं, वहाँ हिंदू गानों पर रोक। मैं इस्लाम की आलोचना करता हूँ कि इसमें ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लामी भूमि) की अवधारणा है, जहाँ गैर-मुसलमानों को दबाया जाता है। रमजान में यह और तेज हो जाता है, क्योंकि रोजेदार खुद को ‘अधिक धार्मिक’ मानते हैं। 8 गिरफ्तारियाँ हुईं, लेकिन सवाल है – कब तक हिंदू अपने ही देश में डरते रहेंगे?
रमजान 2025 का खूनी इतिहास: 70 घटनाएँ और लव जिहाद
लेख में 2025 के रमजान में 70 घटनाओं का जिक्र है – हत्याएँ, मॉब लिंचिंग, होली पर हमले, लव जिहाद। बिहार में राकेश कुमार की हत्या, दिल्ली में राधेश्याम की मौत, नागपुर में दंगे। लव जिहाद में आसिफ ने कोमल को मार डाला, नदीम ने पहचान छिपाकर धोखा दिया। एक पूर्व मुसलमान के रूप में मैं कहता हूँ कि ‘लव जिहाद’ इस्लामी ‘दावा’ (प्रचार) का हिस्सा है, जहाँ हिंदू लड़कियों को फँसाकर धर्मांतरण कराया जाता है। कुरान में ‘काफिर महिलाओं’ से शादी की इजाजत है, लेकिन यह धोखे से होता है। मंदिरों पर हमले, रेल पलटाने की साजिशें – यह ‘गजवा-ए-हिंद’ की मानसिकता है, जो भारत को इस्लामी बनाने का सपना देखती है। बच्चों और बुजुर्गों पर अत्याचार, जैसे गोपालगंज में 80 साल की महिला पर बलात्कार, इंसानियत को शर्मसार करता है।
मंदिर अपवित्र करना और टेररिज्म: इस्लामी कट्टरता की नई ऊँचाई
कर्नाटक में मंदिर पर पत्थर फेंकना क्योंकि ‘गुस्सा आता है’, बंगाल में मूर्तियाँ तोड़ना, रोटियों पर थूकना – यह सब इस्लामी घृणा का परिणाम है। रेल पटरी पर बोल्ट रखना टेररिज्म है। मैं आलोचक हूँ कि इस्लाम के कुछ हिस्सों में ‘जिहाद’ को हिंसा के रूप में व्याख्या किया जाता है, जो युवाओं को भटकाता है। भारत में हिंदू ‘दोयम दर्जे’ के नागरिक क्यों? क्योंकि सेक्युलर राजनीति तुष्टीकरण करती है।
निष्कर्ष: इस्लाम सुधार की जरूरत और हिंदुओं का जागरण
दोस्तों, यह लेख साबित करता है कि रमजान में हिंसा कोई संयोग नहीं, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथ की साजिश है। एक एक्स मुस्लिम के रूप में मैं कहता हूँ – इस्लाम को सुधार की जरूरत है, कट्टर व्याख्याओं को त्यागें। हिंदू समाज जागे, अपनी सुरक्षा करे। कानून सबके लिए बराबर हो, तुष्टीकरण बंद हो। अगर हम चुप रहे, तो यह हिंसा बढ़ेगी। मेरे जैसे एक्स मुस्लिम की आवाज सुनें, जो अंदर से जानते हैं कि समस्या कहाँ है।
सतर्क रहें, सुरक्षित रहें। जय हिंद!
(यह ब्लॉग लेख पर आधारित है और मेरी व्यक्तिगत राय है।)




