नमस्ते दोस्तों, मैं एक Ex- Muslim हूं, जो सालों तक इस्लाम के अंदर रहा और अब इसकी आलोचना करता हूं। कुरान ,हदीसों और इतिहास को पढ़कर मैंने समझा है कि कैसे कुछ नेता मजहबी ग्रंथों का गलत इस्तेमाल करके समुदाय को गुमराह करते हैं। आज मैं AIMIM के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के हालिया बयान पर बात करूंगा, जहां उन्होंने मुसलमानों को “हम दो, हमारे दो दर्जन” बच्चे पैदा करने की अपील की है। यह बयान न सिर्फ गैरजिम्मेदाराना है, बल्कि इस्लामी शिक्षाओं का विकृत रूप है। आइए, कुरान और हदीसों के संदर्भ से इसकी पड़ताल करें।
जनसंख्या बढ़ाने की अपील: अल्लाह की देन या मानव निर्मित संकट?
शौकत अली ने कहा कि बच्चे अल्लाह की देन हैं, इसलिए जितने मिलें, उतने लेते रहो। उन्होंने मुसलमानों से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहा, ताकि देश मजबूत हो। चीन का उदाहरण देकर वे दावा करते हैं कि ज्यादा आबादी से ताकत आती है। लेकिन एक Ex- Muslim के रूप में मैं पूछता हूं – क्या यह इस्लाम की सच्ची शिक्षा है? कुरान में सूरह अल-बकरा (2:223) में पत्नियों को “खेत” कहा गया है, लेकिन इसका मतलब अनियंत्रित जनसंख्या नहीं। हदीस में (सहीह बुखारी, वॉल्यूम 7, बुक 62, नंबर 135) पैगंबर मुहम्मद ने कहा है कि बच्चे अल्लाह की नेमत हैं, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि आप बच्चों की लाइन लगा दें।
इस्लाम में परिवार नियोजन की भी अनुमति है, जैसे सेक्स के बाद लिंग को बाहर निकल कर बच्चा होने से बचना (coitus interruptus) का तरीका, जो हदीसों में वर्णित है (सहीह मुस्लिम, बुक 8, नंबर 3371)। लेकिन कट्टरपंथी नेता जैसे शौकत अली इसे अनदेखा कर जनसंख्या को “जिहाद” का हथियार बनाते हैं। वे खुद कहते हैं कि उनके 8 और भाई के 16 बच्चे हैं। क्या वे इनकी परवरिश की जिम्मेदारी लेते हैं? भारत में जहां गरीबी, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी है, वहां यह अपील समुदाय को पिछड़ेपन की ओर धकेलती है। कुरान में सूरह अल-आराफ (7:31) में फिजूलखर्ची और अतिशयोक्ति की मनाही है – क्या अनियंत्रित बच्चे पैदा करना यही नहीं है?
हिंदुओं पर निशाना: पीड़ित कार्ड या इस्लामी विभाजनवाद?
अली ने हिंदुओं को निशाना बनाते हुए कहा कि वे मुसलमानों की बढ़ती आबादी से परेशान हैं। उन्होंने हिंदू संगठनों की महिलाओं पर मुसलमानों के साथ बुरा बर्ताव का आरोप लगाया, मदरसों को बंद करने, बुर्का खींचने, दाढ़ी नोचने, मीट पर लिंचिंग और यात्रा में असुरक्षा की बात की। यह क्लासिक “तकिया” (छल) का उदाहरण है, जो इस्लामी शिक्षाओं में अल्पसंख्यक स्थिति में इस्तेमाल होता है। कुरान में सूरह अल-इमरान (3:28) में गैर-मुस्लिमों से दोस्ती की मनाही है, अगर वे दुश्मन हों, लेकिन यहां पीड़ित बनकर विभाजन फैलाया जा रहा है।
मदरसे क्यों बंद हो रहे हैं? क्योंकि कई मदरसे कट्टरवाद सिखाते हैं, न कि आधुनिक शिक्षा। मैंने खुद मदरसे में जाकर देखा है, जहां कुरान की रट्टा लगवाई जाती है, लेकिन विज्ञान और तर्क की कोई जगह नहीं। हदीस में (सुन्नन अबू दाऊद, नंबर 3644) शिक्षा पर जोर है, लेकिन ये नेता इसे राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं। लिंचिंग जैसी घटनाएं गलत हैं, लेकिन क्या ऐसी घटनाएं मुसलमानों के तरफ से नहीं हो रही है क्या और क्या मुस्लिम समुदाय अपने अंदर सुधार करेगा? कुरान में सूरह अल-माइदा (5:32) में हत्या की मनाही है, लेकिन नेता बीजेपी/ RRS की साजिश का बहाना बनाकर समुदाय को अलग-थलग रखते हैं। यह इस्लाम की “उम्मा” (समुदाय) की अवधारणा का दुरुपयोग है, जो विभाजन को बढ़ावा देती है।
निष्कर्ष: इस्लाम के नाम पर लोगों को भड़कते है ये मुस्लिम नेता
शौकत अली के बयानों से सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है, और यह जरूरी है। ये बयान मुस्लिम समुदाय को गुमराह करते हैं, देश की एकता को खतरा पहुंचाते हैं और ऐसे मुस्लिम नेता एक बार और विभाजन की बीज बो रहे हैं। एक Ex- Muslim के रूप में मैं जानता हूं कि मुस्लिम नेताओं का यही इतिहास रहा है, इसी कारण बंटवारा हुआ लाखों लोग मारे गए और लोग बेघर हुए है।
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(यह ब्लॉग मेरे व्यक्तिगत अनुभव, कुरान और हदीसों के अध्ययन पर आधारित है।)




