नमस्कार दोस्तों, मैं एक Ex-Muslim हूँ, जो इस्लाम की कट्टरता से बाहर निकलकर सच्चाई की तलाश में लगा हुआ हूँ। मेरे ब्लॉग में मैं अक्सर इस्लाम की उन व्याख्याओं पर बात करता हूँ जो समाज को बाँटती हैं और राष्ट्र की एकता को कमजोर करती हैं। आज मैं उस हालिया विवाद पर बात करूँगा जो “वंदे मातरम” को लेकर छिड़ा है। केंद्र सरकार ने इस राष्ट्रगीत को पूर्ण सम्मान देने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए हैं, लेकिन कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे मजहबी आजादी पर हमला बता दिया। यह लेख पढ़कर मुझे लगा कि यह मुद्दा सिर्फ एक गीत का नहीं, बल्कि उस कट्टर सोच का है जो इस्लाम के नाम पर राष्ट्रवाद को ठुकराती है। आइए, इस पर गहराई से चर्चा करें।
वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व और सरकारी कदम
सबसे पहले, याद करें कि “वंदे मातरम” क्या है। यह बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित गीत है, जो 1875 में लिखा गया और “आनंदमठ” उपन्यास में शामिल हुआ। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना, जहाँ क्रांतिकारी इसे गाते हुए मौत को गले लगाते थे। मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में तिरंगा फहराते समय इसी पर भरोसा किया, और अनगिनत शहीदों ने इसे अंतिम शब्द बनाया। 1950 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगान “जन गण मन” के समान दर्जा दिया।
अब केंद्र सरकार ने इसके 150 साल पूरे होने पर नए नियम बनाए: सभी छह छंद अनिवार्य, कुल 3 मिनट 10 सेकंड का गायन, सरकारी कार्यक्रमों में बजाना जरूरी, और राष्ट्रगान से पहले इसे गाना। अगर दोनों साथ हों, तो पहले “वंदे मातरम”। यह कदम राष्ट्रभक्ति को मजबूत करने का है, जो दशकों से तुष्टीकरण की राजनीति के कारण दबा पड़ा था। सिनेमाघरों में इसे अनिवार्य न रखना व्यावहारिक है, ताकि इसकी गरिमा बनी रहे। मुझे लगता है, यह सही दिशा में कदम है – राष्ट्र के प्रतीकों को सम्मान देना हर नागरिक का कर्तव्य है।
मुस्लिम संगठनों का विरोध: एक पुरानी स्क्रिप्ट
लेकिन जैसे ही यह आदेश आया, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह मजहबी स्वतंत्रता पर हमला है। उनका तर्क? गीत में मातृभूमि को “देवता” के रूप में दिखाया गया, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) के खिलाफ है। AIMPLB ने इसे गैर-कानूनी बताकर कोर्ट जाने की धमकी दी। शोएब जमई, इमरान मसूद जैसे नेता अनुच्छेद 25 का हवाला देते हैं।
एक Ex-Muslim के रूप में, मैं पूछता हूँ: क्या मातृभूमि को “माँ” कहना और नमन करना वाकई अल्लाह के खिलाफ है? “वंदे मातरम” का मतलब है “माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ”। यह पूजा नहीं, बल्कि सम्मान है। इस्लाम में माँ-बाप का सम्मान अनिवार्य है, तो जन्मभूमि क्यों नहीं? यह तर्क मुझे हास्यास्पद लगता है। कुरान में कहीं नहीं लिखा कि अपनी धरती को प्यार करना शिर्क है। यह कट्टर व्याख्या है, जो इस्लाम को राजनीतिक हथियार बनाती है। मैंने खुद इस्लाम छोड़ा क्योंकि ऐसी व्याख्याएँ मानवता से ऊपर मजहब को रखती हैं।
जिन्ना की विरासत: 1937 से 2026 तक
यह विरोध नया नहीं। 1908 में मुस्लिम लीग ने शुरू किया, 1937 में जिन्ना ने इसे “मुस्लिम विरोधी” कहा। नेहरू ने तुष्टीकरण में घुटने टेक दिए, और कांग्रेस ने गीत के सिर्फ दो छंद रखे। परिणाम? देश का विभाजन। आज मदनी, ओवैसी, शफीकुर्रहमान बर्क वही भाषा बोलते हैं। देवबंद से फतवे, बिहार विधानसभा में बहिष्कार, संसद में विरोध – यह अलगाववाद है। कुछ सिख संगठन भी कूद पड़े, इसे “हिंदुत्व थोपना” कहकर।
मुझे लगता है, यह “मिनी मुस्लिम लीग” है। जिन्ना की सोच कि मजहब राष्ट्र से ऊपर है, आज भी जिंदा है। लेकिन अब समय बदल रहा है। मोदी जी ने संसद में 121 बार “वंदे मातरम” कहा, जो उन ताकतों को जवाब है।
मेरी नजर में समस्या: कट्टरता, न कि मजहब
एक Ex-Muslim क्रिटिक के तौर पर, मैं कहता हूँ कि समस्या इस्लाम के साथ साथ उसकी कट्टर व्याख्या में भी है। अगर अल्लाह सर्वव्यापी है, तो धरती को नमन से क्या खतरा? यह सोच राष्ट्रवाद को मजहब के चश्मे से देखती है, जो खतरनाक है। पाकिस्तान में भी राष्ट्रगान गाते हैं, लेकिन भारत में विरोध क्यों? क्योंकि यहाँ लोकतंत्र है, जहाँ ऐसी सोच फलती है।
संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन राष्ट्र के प्रतीकों का अपमान नहीं। अगर कोई गीत गाने से इनकार करता है, तो वह नागरिकता पर सवाल उठाता है। मुझे याद है, जब मैं मुसलमान था, तो ऐसी बातें सुनकर असहज होता था। लेकिन बाहर निकलकर समझा कि राष्ट्र पहले है।
निष्कर्ष: एकजुट भारत की जरूरत
दोस्तों, “वंदे मातरम” राष्ट्र की एकता का प्रतीक है। इसे मजहबी चश्मे से देखना गलत है। सरकार का कदम सही है – यह तुष्टीकरण खत्म कर राष्ट्रभक्ति को मजबूत करेगा। अगर आप भी Ex-Muslim हैं या इस्लाम पर सवाल उठाते हैं, तो कमेंट में बताएँ। क्या आपको लगता है कि ऐसी सोच बदल सकती है? या यह हमेशा विभाजनकारी रहेगी?
वंदे मातरम! भारत माता की जय!
(यह ब्लॉग मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, आधारित उस लेख पर जो हालिया विवाद पर है। कोई नफरत नहीं, सिर्फ सच्चाई की तलाश।)





