तालिबान का नया ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’: इस्लामी कट्टरता की एक और क्रूर मिसाल

तालिबान का नया ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’: इस्लामी कट्टरता की एक और क्रूर मिसाल

नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम है एक्स-मुस्लिम भारत (या जैसा कि मैं खुद को कहता हूं, एक पूर्व मुसलमान जो अब इस्लाम की आलोचना करता है)। मैं सालों से इस्लाम की उन सच्चाइयों पर लिखता हूं जो बचपन में मुझे सिखाई गईं, लेकिन जिन्हें मैंने बाद में खारिज कर दिया। इस्लाम की किताबों और इतिहास को पढ़ने के बाद, मैंने देखा कि कैसे ये विचारधाराएं मानवता के खिलाफ जाती हैं – खासकर महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के साथ। आज मैं बात करूंगा अफगानिस्तान में तालिबान के नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ की, जो 4 जनवरी 2026 को जारी हुआ है। ये कानून नहीं, बल्कि कट्टरता का एक हथियार है, जो समाज को बांटता है, गुलामी को जायज ठहराता है और विरोध को मौत से दबाता है। एक पूर्व मुसलमान के तौर पर, मुझे ये देखकर गुस्सा आता है कि कैसे ‘हनफी इस्लाम’ के नाम पर इंसानियत को कुचला जा रहा है। चलिए, विस्तार से समझते हैं।

 

एक ही जुर्म, लेकिन सजा स्टेटस के हिसाब से

सबसे पहले, ये कोड समाज को चार हिस्सों में बांटता है: उलेमा (धार्मिक विद्वान), अशरफ (संपन्न वर्ग), मध्यम वर्ग और निचला तबका। यानी, अपराध एक ही हो, लेकिन सजा आपकी ‘सोशल रैंकिंग’ पर निर्भर करेगी। अगर कोई उलेमा कोई गलती करता है, तो बस डांट मिलेगी – जैसे कोई बच्चे को प्यार से समझाता है। दूसरी कैटेगरी में कबायली नेता, मिलिट्री कमांडर या अमीर लोग आते हैं; इन्हें सिर्फ चेतावनी या समन मिलेगा, जेल या शारीरिक सजा नहीं। मिडिल क्लास को जेल हो सकती है, लेकिन सबसे नीचे वाले आम आदमी को? मौत, कोड़े या और भी क्रूर सजाएं।

ये मुझे याद दिलाता है कुरान और हदीसों में वर्णित वो सिस्टम, जहां ‘मालिक’ और ‘गुलाम’ का फर्क था। इस्लामिक इतिहास में गुलामों को अलग सजा मिलती थी, और आज तालिबान उसी को मॉडर्न कानून का नाम दे रहा है। क्या ये न्याय है? नहीं, ये भेदभाव है – वो भेदभाव जो इस्लाम की जड़ों में है, लेकिन जिसे मैंने छोड़ दिया क्योंकि ये इंसानियत के खिलाफ है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन तो है ही, लेकिन इससे ज्यादा, ये दिखाता है कि कैसे कट्टर इस्लाम अमीरों और उलेमाओं को बचाता है, जबकि गरीबों को मारता है।

 

 धार्मिक अल्पसंख्यकों पर जुल्म की साजिश

कोड ‘हनफी इस्लाम’ को ही असली इस्लाम मानता है। आर्टिकल 2 के क्लॉज 8 में साफ कहा गया है कि हनफी मानने वाले ही सच्चे मुसलमान हैं; बाकी – जैसे शिया, इस्माइली या अहल-ए-हदीस – काफिर। और अगर कोई अपना धर्म बदलता है? दो साल की जेल! अफगानिस्तान में शिया, सिख, हिंदू जैसे अल्पसंख्यक पहले से दबे हुए हैं, और अब ये कानून उन्हें और कुचलेगा। ‘बिदअत’ (नई बातें) का लेबल लगाकर किसी को भी सजा दी जा सकती है।

एक पूर्व मुसलमान के रूप में, मैं जानता हूं कि इस्लाम में ‘अपोस्टेसी’ (धर्म त्याग) की सजा मौत है – हदीसों में पैगंबर के समय से ये चलन है। तालिबान बस उसी को कोडिफाई कर रहा है। लेकिन क्या ये सही है? नहीं, ये दमन है। ईशनिंदा के नाम पर कोड़े, इस्लामी फैसलों का ‘मजाक उड़ाने’ पर दो साल जेल – और ‘मजाक’ क्या है, ये जज तय करेगा। आर्टिकल 14 में ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के नाम पर मारने की इजाजत! ये सब मुझे उन दिनों की याद दिलाता है जब मैं मस्जिद में बैठकर सोचता था कि क्यों इस्लाम में आलोचना की कोई जगह नहीं। आज मैं कहता हूं: ये कट्टरता है, जो अल्पसंख्यकों को मिटा देगी।

 

 डांस, गाने और संस्कृति पर पाबंदी – लोकल परंपराओं का अंत

आर्टिकल 59 डांस करने या देखने को अपराध बनाता है। परंपरागत अफगान नृत्य, संगीत – सब बंद। आर्टिकल 13 में ‘नैतिक भ्रष्टाचार’ की जगहों को खत्म करने की बात है, जो ब्यूटी पार्लरों या महिलाओं की सभाओं पर हमला करेगा। ‘भ्रष्टाचारी’ होना ही अपराध – लेकिन ‘भ्रष्टाचार’ क्या है, ये तय कौन करेगा? तालिबान!

ये मुझे इस्लाम की उन हदीसों की याद दिलाता है जहां संगीत और नृत्य को हराम कहा गया है। लेकिन क्या ये मानवता है? नहीं, ये संस्कृति का विनाश है। अफगानिस्तान की लोकल परंपराएं, जो सदियों से चली आ रही हैं, अब मर जाएंगी। एक आलोचक के तौर पर, मैं कहता हूं: इस्लाम की कट्टर व्याख्या हमेशा से रचनात्मकता को दबाती आई है।

 

गुलामी को कानूनी मान्यता – अंतरराष्ट्रीय कानून की धज्जियां

सबसे शर्मनाक हिस्सा: कोड में ‘गुलाम’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल। आर्टिकल 15 कहता है कि सजा ‘आजाद’ या ‘गुलाम’ होने पर निर्भर करेगी। आर्टिकल 4 में ‘मालिक’ को सजा देने का अधिकार! अंतरराष्ट्रीय कानून गुलामी को पूरी तरह खारिज करता है, लेकिन तालिबान इसे जायज ठहरा रहा है। ये मुझे इस्लामिक इतिहास के गुलाम व्यापार की याद दिलाता है – कुरान में गुलामों का जिक्र है, और पैगंबर के समय गुलामी सामान्य थी। लेकिन 21वीं सदी में ये? ये पीछे की ओर जाना है।

 

 महिलाओं और बच्चों पर जुल्म की खुली छूट

महिलाओं के लिए: सख्त ड्रेस कोड, महरम (पुरुष अभिभावक) जरूरी, सार्वजनिक जगहों पर आवाज सुनने पर सजा। ब्यूटी पार्लर बंद। बच्चों के लिए: पिटाई अपराध नहीं, सिर्फ अगर हड्डी टूटे या स्किन फटे। यौन उत्पीड़न? कोई जिक्र नहीं। आर्टिकल 48 में पिता 10 साल के बच्चे को नमाज न पढ़ने पर सजा दे सकता है।

ये सब इस्लाम की पितृसत्तात्मक व्याख्या से आता है – जहां महिलाएं और बच्चे संपत्ति जैसे हैं। एक पूर्व मुसलमान के रूप में, मैंने देखा है कैसे ये विचारधाराएं घरों में दमन पैदा करती हैं। तालिबान इसे कानून बना रहा है, जो महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद कर देगा।

 

विरोध पर मौत – दमन का अंतिम हथियार

आर्टिकल 4 का क्लॉज 6 कहता है: अगर कोई ‘पाप’ करता पकड़ा जाए, तो कोई भी मुसलमान उसे सजा दे सकता है। विरोधियों की बैठक की खबर न देने पर दो साल जेल। ‘बागी’ को मौत। ये कानून नहीं, तानाशाही है। इस्लाम में ‘फितना’ (विद्रोह) को दबाने की बात है, और तालिबान उसी को लागू कर रहा है। कोई वकील, कोई मुआवजा, कोई स्वतंत्र जांच – सिर्फ स्वीकारोक्ति या गवाही पर सजा। टॉर्चर की इजाजत!

 

अंत में: ये इस्लाम की सच्चाई है?

दोस्तों, ये कोड सिर्फ तालिबान का नहीं, बल्कि कट्टर इस्लाम की एक मिसाल है। मैंने इस्लाम छोड़ा क्योंकि मैंने देखा कि कैसे ये विचारधाराएं समानता, स्वतंत्रता और मानवता को नकारती हैं। अफगानिस्तान के लोग – खासकर महिलाएं, बच्चे और अल्पसंख्यक – इस जुल्म में जी रहे हैं। दुनिया को चुप नहीं रहना चाहिए। अगर आप मेरी तरह सोचते हैं, तो कमेंट्स में बताएं। क्या ये न्याय है, या कट्टरता? मुझे लगता है, जवाब साफ है।

 

(नोट: ये जानकारी विभिन्न स्रोतों से ली गई है, जैसे रावदारी और अफगानिस्तान इंटरनेशनल। लेकिन मेरी आलोचना मेरे अनुभव से आती है।)

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