इस्लाम के नाम पर फैले कट्टरपंथी उन्माद ने दक्षिण एशिया को एक रक्तरंजित युद्धक्षेत्र बना दिया है, जहां “गुस्ताख ए नबी” (ब्लासफेमी) जैसे झूठे आरोप अल्पसंख्यक हिंदुओं को कुचलने का सबसे घातक हथियार बन चुके हैं। ये कट्टरपंथी, जो खुद को इस्लाम का रक्षक बताते हैं, विरोध प्रदर्शन की आड़ में लूटपाट, सामूहिक बलात्कार, मंदिरों पर हमले और जिंदा जलाने जैसी बर्बरताएं अंजाम देते हैं। लेकिन असली मकसद क्या है ? जवाब बिल्कुल सीधा है हिंदू समुदाय को डराकर पलायन कराना और इस्लामी वर्चस्व स्थापित करना।
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद (अगस्त 2024) से दिसंबर 2025 तक, हिंदुओं पर 2,442 से ज्यादा हमले दर्ज हो चुके हैं—इनमें 152 मंदिर ध्वस्त, 130 से अधिक घर जलाए गए, और कम से कम 23 हिंदू मारे गए। ये आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के प्रमाण हैं, जो इस्लामी कट्टरवाद की विषाक्त विचारधारा को उजागर करते हैं।
दुनिया की मानवाधिकार संस्थाएं चुप हैं, क्योंकि ये “मजहबी स्वतंत्रता” के नाम पर हो रही हत्याएं हैं। लेकिन सच्चाई यही है: जब कट्टरपंथी “अल्लाह-हू-अकबर” के नारों के बीच निर्दोषों का खून बहाते हैं, तो ये इस्लाम को ना मनने वालो को एक चेतावनी है—इस्लाम क़ुबुल कर लो या मर जाओ।
दीपू चंद्र दास: गुस्ताख ए नबी (ब्लासफेमी) के झूठे आरोप पर जिंदा जलाया गया एक हिंदू युवक—बर्बरता की चरम सीमा
बांग्लादेश के मायमेन्सिंह जिले के भालुका उपजिले में 19 दिसंबर 2025 को एक ऐसी घटना घटी, जो इस्लामी कट्टरपंथ की क्रूरता का जीता-जागता प्रमाण है। 25-27 वर्षीय हिंदू युवक दीपू चंद्र दास (Dipu Chandra Das), जो एक गारमेंट फैक्टरी में काम करता था, को कथित तौर पर “सभी धर्म समान हैं” कहने के आरोप में एक उन्मादी मुस्लिम भीड़ ने घेर लिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियोज इस बर्बरता के साक्षी हैं: पहले दीपू को थाने से घसीटकर बाहर निकाला गया, फिर सैकड़ों कट्टरपंथियों ने उसे नंगा कर लाठियों से पीटा, पेड़ से बांध दिया, और आखिरकार पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। उसके चीखने-चिल्लाने की आवाजें आज भी उन वीडियोज में गूंज रही हैं, जो इतनी हृदयविदारक हैं कि कोई संवेदनशील इंसान उन्हें देखकर कांप उठे। जांच में कोई सीधा सबूत नहीं मिला कि दीपू ने वाकई कोई अपमानजनक टिप्पणी की थी—ये महज एक अफवाह थी, जो कट्टरपंथियों के लिए हत्या का बहाना बनी।
इस घटना के बाद अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने 7 से 10 लोगों की गिरफ्तारी की घोषणा की, लेकिन ये दिखावा मात्र है। दीपू का परिवार टूट चुका है—उनके पिता ने मीडिया को बताया कि बेटे की लाश को पहचानना भी मुश्किल था, और अब वे डर के साए में जी रहे हैं। ये हत्या संयोगवश नहीं हुई; ये उसी समय घटी जब बांग्लादेश में युवा नेता शरीफ ओसमान हादी की मौत पर विरोध प्रदर्शन भड़क रहे थे, और कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी सक्रिय हो गया था। दीपू की मौत ने पूरे बांग्लादेश में हिंदू समुदाय को भयभीत कर दिया—30,000 से ज्यादा हिंदुओं ने ढाका में रैली निकाली, सुरक्षा की मांग की। लेकिन सवाल वही है: जब कानून दम तोड़ देता है, तो अल्पसंख्यक कहां जाएं? ये घटना 2024-2025 में हिंदुओं पर हुए 2,442 हमलों का हिस्सा है, जहां महिलाओं पर अत्याचार, घरों की लूट और मंदिरों पर आगजनी आम हो गई है।
विरोध प्रदर्शन का पुराना पैटर्न: शेख हसीना की “क्रांति” से अब तक, हिंदुओं का चुन-चुनकर निशाना—आंकड़ों की मार्मिक कहानी
ये पैटर्न नया नहीं, बल्कि इस्लामी कट्टरवाद का सदियों पुराना हथकंडा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिराने के लिए शुरू हुई “छात्र क्रांति” को शुरू में लोकतंत्र की जीत कहा गया, लेकिन हकीकत में ये हिंदू-विरोधी हिंसा का तूफान था। 4 से 20 अगस्त 2024 के बीच ही 2,010 से ज्यादा हमले हुए, जो 45 जिलों में फैले। कुल 100 से ज्यादा मौतें हुईं, जिनमें हिंदू पार्षद हरधन रॉय हारा और काजल रॉय जैसे प्रमुख नाम शामिल थे। कट्टरपंथियों ने हिंदू नेताओं, पत्रकारों और कलाकारों को विशेष रूप से निशाना बनाया—उनके घर लूटे, महिलाओं को रेप या परिवार की हत्या के बीच चुनने पर मजबूर किया गया।
जनवरी 2025 तक, मानवाधिकार संगठनों ने 858 मौतों की पुष्टि की, जिनमें से कई हिंदू समुदाय से। नवंबर 2025 तक राजनीतिक हिंसा में 300 से ज्यादा जानें गईं। हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के अनुसार, 2024 में 2,200 मामले दर्ज हुए, जो 2023 के 302 से 7 गुना ज्यादा हैं। ये “विरोध” नहीं, बल्कि जिहादी साजिश है—जिसमें अफवाहें फैलाकर भीड़ जुटाई जाती है, और अल्पसंख्यकों को मिटाया जाता है। बांग्लादेश में हिंदू आबादी पहले से ही घटकर 8% रह गई है; ये हमले पलायन को तेज कर रहे हैं, जो इस्लामी एकाधिकार की दिशा में एक कदम है।
गुस्ताख ए नबी (ब्लासफेमी): कट्टरपंथियों का सबसे घातक हथियार—2024-2025 की प्रमुख घटनाओं का खुलासा
बांग्लादेश जैसे इस्लामी देशों में ब्लासफेमी का कानून हिंदुओं के लिए मौत का फरमान है। 2024-2025 में दर्जनों मामले सामने आए, जहां झूठे आरोपों पर भीड़ ने न्याय के नाम पर हत्या को अनज़ाम कर दिया। यहां कुछ प्रमुख घटनाएं:
- आकाश दास केस (दिसंबर 2024): एक युवा हिंदू ने फेसबुक पर कुरान के बारे में कथित अपमानजनक कमेंट पोस्ट किया। नतीजा? उन्मादी भीड़ ने 130 हिंदू घरों और 20 मंदिरों को जला दिया। आकाश को पीट-पीटकर मार डाला गया, और पूरे इलाके में दंगे भड़क गए। ये घटना ब्लासफेमी कानून की आड़ में सामूहिक हिंसा का प्रतीक बनी।
- प्रांत तालुकदार (जनवरी 2025): चटगांव के पटेंगा काठगढ़ में मुस्लिम चरमपंथियों ने हिंदू युवक प्रांत को अगवा कर घंटों यातनाएं दीं। आरोप? ईशनिंदा। उसे बुरी तरह पीटा गया, और रिहा करने के बाद भी परिवार डर के मारे छिपा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में इसे उल्लेखित किया गया।
- रिदॉय रोबी दास (नवंबर 2024): करीमगंज उपजिला में नाई का काम करने वाले रिदॉय को तीन मौलानाओं ने किडनैप किया। बहाना? एक मुस्लिम युवती से प्रेम संबंध। यातनाओं से उनकी मौत हो गई, जो ब्लासफेमी से जुड़ी धार्मिक साजिश का हिस्सा था।
- हृदय पाल (अक्टूबर 2024): फरीदपुर जिले के बोलमारी में पैगंबर मुहम्मद के अपमान के आरोप में उन्मादी भीड़ ने कादिरदी डिग्री कॉलेज को घेर लिया। हृदय को मारने की कोशिश की गई, और कॉलेज में हिंसा भड़क गई।
- धनंजय और रुबेल त्रिपुरा (2024): खगराचारी और रंगमती में एक मुस्लिम अपराधी की मौत की अफवाह पर मुस्लिम भीड़ ने इन हिंदू आदिवासियों की हत्या कर दी। जनजातीय समुदाय पर हमले बढ़े, और अफवाहें हथियार बनीं।
ये मामले दर्शाते हैं कि ब्लासफेमी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कट्टरपंथियों का “लाइसेंस टू किल” है। 2025 में भी ऐसे 200 से ज्यादा हमले हुए, जहां मंदिर, घर और दुकानें निशाना बने।
अफवाहें और सरहद पार की दरिंदगी: पाकिस्तान का सियालकोट केस—एक समान क्रूरता
ये पैटर्न बांग्लादेश तक सीमित नहीं; पाकिस्तान में भी यही चलता है। दिसंबर 2021 में सियालकोट में श्रीलंकाई नागरिक प्रियांथा कुमारा (48 वर्षीय फैक्टरी मैनेजर) को ब्लासफेमी के आरोप में एक फैक्टरी वर्कर्स की भीड़ ने घेर लिया। आरोप? कुरान की आयतों वाली पोस्टर्स हटाने का। भीड़ ने उन्हें घंटों यातनाएं दीं—पीटा, नंगा किया, और आखिरकार जिंदा जला दिया। वीडियो वायरल होने पर दुनिया सिहर उठी। अदालत ने 6 लोगों को मौत की सजा सुनाई, लेकिन तहरीक-ए-लब्बैक जैसे कट्टरपंथी ग्रुप्स आज भी सक्रिय हैं। प्रियांथा का परिवार आज भी न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन पाकिस्तान के ब्लासफेमी कानून (जो मौत की सजा देते हैं) अल्पसंख्यकों के लिए जाल हैं। बांग्लादेश से पाकिस्तान तक, अफवाह फैलाओ, भीड़ जुटाओ, और गैर-मुस्लिमों को खत्म करो—ये इस्लामी कट्टरवाद का साझा DNA है।
चुप्पी तोड़ो, वरना अल्पसंख्यक मिट जाएंगे
दीपू चंद्र की जलती लाश, रिदॉय रोबी दास की यातनाएं, और प्रियांथा कुमारा की चीखें ये साबित करती हैं कि जब मजहबी उन्माद सर चढ़ता है, तो कानून और इंसानियत दोनों दम तोड़ देते हैं। ये हमले “जन आक्रोश” नहीं, बल्कि हिंदुओं के खिलाफ सोची-समझी नफरत हैं। दक्षिण एशिया से अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने की ये साजिश सफल हो जाएगी, अगर दुनिया—खासकर भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय—अब भी चुप रही। ये आवाजें दबाई जा रही हैं, लेकिन सत्य कभी नहीं मरेगा। हिंदुओं की रक्षा करो, वरना कल ये आग सबको भस्म कर देगी।





